शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

’लाल पेंसिल....’






अरण्य...



लाल पेन्सिल





मानव कौल

Scene-1

सब बच्चे embryo की मुद्रा मे लेटे है. एक बीट को फॉलो करते हुए सब धीरे धीरे उठते है. पास में पडे पेन और कागज को देख्ते है. कागज लेकर अपनी जगह जाते है और लिखने लगते हैं.
सब सामने देखते है और सीधे बैठ जाते है.
उसके बाद सभी क्लास का lesson रट रहे हैं... जो सिर्फ साऊंड़ है... कुछ gestures है... और कुछ rhythm है। उनके बीच में नंदु है जो सब कुछ गलत कर रहा होता है.. वह कोशिश करता है कि सब कुछ सही करे पर उससे कुछ भी सही नहीं होता। तभी द्रुपद नाम का एक टीचर आ जाता है। वह नंदु को देखता है कि वह सब कुछ गलत कर रहा हैं... वह उससे अलग से करने को कहता है... पर वो नहीं कर पाता....
(नीतू द्रुपद के पास जाती है)
नीतू- सर ये तो सब गलत कर रहा है.
(द्रुपद को कॉपी दिखाती है और कर के बताती है, द्रुपद उस्से कॉपी ले लेता है नंदु को देता है, वो फिर भी नही कर पाता। द्रुपद उसे वापिस अपनी जगह बिठा देता है। द्रुपद पान थूकने के लिये बाहर जाता है, सभी बच्चे नंदु को चपत लगाते हैं. द्रुपद वापिस आता है)
द्रुपद –तो इस बार कौन कौन भाग लेगा कविता की प्रतियोगिता में???
(तभी सब फ्रीझ हो जाते है और पिंकी कहती है)
पिंकी- मै इसी क्लास में हूँ पर असल मे नही हूँ,मै यहां रहू या चली जांऊ, किसी को बहुत फरक नहीं पड्ता, चपरासी के अलावा किसी को मेरा नाम तक नहीं पता, लोग मुझे ’ए’ कह्कर बुलाते है, जबकि मेरा नाम पिंकी है. मै कविता लिखना चाह्ती हू. कैसे भी , किसी भी तरह, सबसे अच्छी कविता!
(फ्रीज़ खत्म होता है द्रुपद वापिस बोलना शुरु करता है।)
द्रुपद - पहले इस क्लास में जो अव्वल आएगा वह पूरे स्कूल की प्रतियोगिता में भाग लेगा.. फिर जो इस स्कूल में आव्वल आएगा उसे सारे स्कूलों की कविता की सबसे बड़ी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिलेगा.. और उसके बाद भूल जाओ.. क्योंकि उस प्रतियोगिता में मैं चालीसवें स्थान पर आया था... और मुझसे आगे अभी तक कोई नहीं गया है। तो कौन-कौन भाग लेना चाहता है... ?
पिंकी को छोड़कर सभी लोग अपने हाथ खड़े कर देते है...।
द्रुपद – ’ए’ क्या नाम है तुम्हारा?
पिंकी – पिंकी.
द्रुपद- पिंकी तुम कविता नहीं लिखोगी?
पिंकी- मुझे नहीं आती है...।
द्रुपद- क्यों पिछली बार तो तुमने लिखी थी कविता...
पिंकी- वह पापा ने लिखी थी।
द्रुपद- तो अब...
पिंकी- असल में यह हुआ था कि.....
(पिंकी ऊपर देखती है.....पीछे सिलुअट में... उसे अपने माँ बाप लड़ते हुए दिखते हैं... ।)
बाप- फिर तुमने वही बात कही....।
माँ- मैं वह बात नहीं कह रही हूँ...
बाप- तो क्या कह रही हो..?
माँ- मैं वह बात कह ही नहीं रही थी....
बाप- फिर वही बात..
माँ- तुम फिर वही बोल रहे हो?
बाप- मैं वह नहीं बोल रहा हूँ...
माँ- देखों तुम अभी भी वही बोल रहे हो...
बाप- वही क्या?
माँ- वही... देखो..
बाप- तुम बार-बार वही बात क्यों कर रही हो?
माँ- तुम बार-बार वही कह रहे हो।
बाप- देखों इस्से पहले भी तुमने यही कहा था और अब भी तुम वही कह रही हो।
माँ- मैंने यही बात कब कही...?
बाप- वाह!! तुमने यह बात की ही नहीं?
माँ- तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती।
बाप- अरे!! अब मैंने यही बात कब कही?
माँ- देखों फिर वही बात?
बाप- देखो अभी तुमने ’फिर वही बात कहा ना...’
माँ- हाँ...
बाप- हाँ तो मैं भी वही कह रहा हूँ कि तुम बार-बार वही बात कर रही हो..।
माँ- अरे तुम बार-बार वही बात कर रहे हो।
बाप- अरी अभी तो तुम मानी थी कि तुमने वही बात कही थी।
माँ- अच्छा ठीक है अब तुम वही बात करो जो तुम पहले कह रहे थे?
बाप- हाँ यही तो कह रहा था मैं पहले भी...।
माँ- यही कहाँ तुम तो वही बात कर रहे थे?
बाप- हाँ मेरा मतलब वही बात...।
माँ- तुम वही नहीं इस्से पहले यही बात कर रहे थे।
बाप- मैं तो कब से वही बात कर रहा हूँ।
माँ- हाँ मैं भी तो कह रही हूँ कि तुम कबसे वही बात कर रहे हो।
बाप- तो सबसे पहले तुमने वह बात छेड़ी ही क्यों?
माँ- अरे मैं वह बात नहीं कर रही थी।
बाप- तो कौन सी बात कर रही थीं?
माँ- अरे मैं वह बात कर ही नहीं रही थी।
बाप- वही बात... यही बात... यही बात.... वही बात...ऊफ...!!!
माँ- नहीं यही बात... वही बात... वही बात.. यही बात...ऊफ!!!..
बाप- ऊफ...
माँ- ऊफ...
( पिताजी अपना सामान उठाते हैं और घर छोड़कर चले जाते हैं...। पिंकी चुप रहती है। लाईट वापिस क्लास में आती है।)
रोमा- सर इसके पापा इनको छोड़क्र चले गए हैं।
पिंकी- नहीं वह वापिस आएगें।
द्रुपद- जो भी है... सबको कविता लिखना है... कंपलसरी है... ठीक है..।
रोमा- सर मैं तो कविता लाई हूँ.. यह रही...।
द्रुपद- अभी नहीं कल देना... ठीक है..।
(प्रत्युश कवि सा दिखने वाला लड़का है...।)
प्रत्युश- हाँ सर .. मैं तैयार हूँ... ।
द्रुपद- अच्छे से लिखना... हें... कोई तकलीफ हो तो मेरे से पूछ भी सकते हो...।
प्रत्युश – सर एक तक़लीफ है!!!
द्रुपद – बाद मे.. तो कविता का विषय है – किताबें
(सब बच्चे ’किताबें’ शब्द कहते हैं… द्रुपद चला जाता है... इसी बीच चपरासी आकर बेल बजाता है। सभी बच्चे पीछे सीधी लाइन मे बैठ जाते हैं। पिंकी क्लास में अकेली रह जाती है... वह रोमा की कॉपी से उसकी कविता चुराकर पढ़ लेती है फिर उस कविता को फाड़ देती है.. तभी उसे एक खट की आवाज़ आती है....। वह पलटकर देखती है तो उसे एक लाल पेंसिल दिखती है... वह उस पेंसिल को उठाती है.. वह बहुत खूबसूरत पेंसिल है...। वह घबराकर इधर उधर देखती है... क्लास में उसके अलावा कोई भी नहीं है....।)
पिंकी- कौन है? कौन है?.... यह पेंसिल किसकी है?
(जब कोई जवाब नहीं देता तब वह लाल पेंसिल अपने पास रख लेती है...।)
Scene-2
(पीछे सारे बच्चे लाईन में बैठे हैं.. वह कविता लिखने की कोशिश करते हैं.... कुछ बहुत ही कविता नुमा लईने बोलने की कोशिश करते हैं... जैसे “किताबें दिल का आईना है.... किताबे जीवन है.. नवल बुक डिपो पर आज बड़ी भीड़ है... वगैहरा वगैहरा”....... पर अंत में कुछ लिख नहीं पाते और चिल्लाकर अपना सिर झुका लेते हैं...। इसी चिल्लाहट के साथ पीछे पिंकी भी चिल्लाती है.... और माँ और पिंकी का सीन शुरु होता है।)
पिंकी- आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.....।
माँ- पिंकी... क्या हुआ क्या कर रही है?
पिंकी- माँ मैं कविता लिख रही हूँ।
माँ- क्या???
पिंकी- मैं कविता लिख रही हूँ।
माँ- क्यों?? क्यों लिख रही है कविता... अरे तबियत तो ठीक है तेरी.. देख पूरा शरीर गर्म हो गया है तेरा... क्यों लिख रही है कविता तू????
पिंकी- माँ कंपलसरी है सबको लिखनी है....
माँ- अरे!!! कंपलसरी है.... ठीक है.. कंपलसरी है तो लिख.... पर ज़्यादा दिमाग़ खर्च मत कर..ऎसे ही लिख दे कुछ भी....
पिंकी- कुछ भी...
माँ- हाँ कुछ भी.. ऎसे ही दो लाईन.. मतलब.. चल लिखना तो शुरु कर.. मैं हूँ यहा.. लिख..
पिंकी- कुछ भी क्या माँ कुछ तो बताओ?
माँ- अरे!! मैं... मैं क्या बताऊं....????? पागल है क्या???
पिंकी- मैंने पापा को फोन किया था... पर वह फोन ही नहीं उठाते हैं.....
माँ- क्यों किया था फोन..? क्यों किया था उनको फोन...? ऎ!!!!!! चल लिख मैं बताती हूँ..... देख ऎसा कर ... पिंकी तू सुन रही है ना????
पिंकी- हाँ....
माँ- हाँ ... तो सुन.. पहले तो तू कुछ लिख... फिर देख क्या लिखा है... फिर लिख जो देखा है... और ऎसे ही लिखती जा.. लिखती जा.. जब तेरा लिखना बंद हो जाए तो समझ ले कि हो गई कविता.. और फिर वह कविता किसी को सुना दे...मुझे नहीं किसी को... वह हो गया तेरा कविता पाठ.... देख कितना सरल है...।
पिंकी- हाँ माँ ’बहुत’ सरल है...!!!!
माँ- अब चल लिख दे.... ऊफ.......
(माँ के सिर में दर्द होने लगता है वह चली जाती है...। पिंकी वापिस लिखने बैठती है तभी उसकी निग़ाह लाल पेंसिल पर पडती है..... वह उसे उठाती है...। और लिखना शुरु करती है... पर पेंसिल अचानक खुद लिखने लगती है... पिंकी उसे रोकने की कोशिश करती है ..पर वह उसके रोके नहीं रुकती है... फिर अचानक पेंसिल उसे बुरी तरह घुमा देती है... पिंकी बेहोश हो जाती है.. और पेंसिल धीरे-धीरे लिखने लगती है...।)
(सामने बैठे सभी बच्चों ने अचानक अपनी कविता पूरी कर ली है... वह सभी एक के बाद एक.. बोलते हैं... वाह... जेबात... गज़ब... मारडाला.. क्या कविता है... वेरी गुड... आय हाय.....।)
Black out…
Scene-3
सारे बच्चे सपना देखने की मुद्रा मे बैठे हैं....
भूमिका - शोर बहुत हो तो कुछ देर बाद शोर सुनाई नहीं देता... बहुत शोर में हम सब चुप हो जाते हैं... और तब सभी सपना देखते हैं। छोटे सपने... अभी इसी वक़्त के सपने... देखो सब अभी सपने में है... मैं भी... पर मैं इनके सपने जानती हूँ... सबके नहीं कुछ के... जैसे.. पीहू....
पीहू को हमेशा लगता है कि कुछ केमरे हैं जो उसे लगातार शूट कर रहे हैं... सालों से....। लंडन के ग्लोब थियेटर में उसके जीवन का लाईव टेलिकास्ट चल रहा है....। एक आदमी उसके पैदा होने के समय से उसके ऊपर फिल्म बना रहा है... और लगभग सौ लोग... लगातार उसकी यह फिल्म देख रहे हैं... सालों से..।
(तभी एक आदमी शेड़ो में दिखता है....जो फिल्म का डायरेक्टर है.... और वह फिल्म को अनाऊंस करता है....।)
डायरेक्टर-ladies and gentlemen.. it’s an honor to present you a film… a film which I believe is going to change the face of cinema… a film which I believe is going to redefine the word ‘cult’… yes ladies and gentlemen..put your hands together for my film… “peehu…”
(सभी ताली बजाते हैं.. पीहू.. पिशाब जाने का इशारा करती है.. पर शायद इशारा बदल गया है... वह आश्चर्य में है.. बाक़ी सारे बच्चे जो दर्शक बन गए है.. वह मूक तालीयाँ बजाने का इशारा करते हैं...।)
भूमिका- उसे लगता है कि वह लंदन की एक बहुत बड़ी अभिनेत्री है.. जबकि इस क्लास में वह महज़ “पीहू” है। यह सोनू है... इसे जहाँ काली चींटी दिखती है उसे वह मुँह में रख लेती है...। उसे लगता है कि जिस तरह उसके मुँह में यह काला चींटा चल रहा है... उसी तरह वह भी इस दुनियाँ के मुँह में चलती है...।
(तभी सोनू को चींटा काट लेता है...।)
इस चींटे ने उसे काटा....
सोनू- मैं इस दुनियाँ को कब काटती हूँ? जब मैं चलती हूँ.. ना.. दौड़ती हूँ.. ना.... ट्रेन एक्सीड़ेट... ना.... जब बंम फटता है तो हम दुनियाँ को काटते हैं.. और दुनियाँ हमे....
(सोनू चींटे को मार डालती है।)
भूमिका- यह नीतू है... इसे लगता है कि यह एक दिन अचानक मर जाएगी... तब लोग इसकी अहमियत समझेंगे....। कुछ लड़के जो इसे प्रेम करते हैं वह इसके प्रेम में आसूं बहाएगें....। स
लड़के- नीतू कभी कह नहीं पाया... उससे पहले ही तू मर गई.... यार आई लव यू नीतू.....।
उसकी दूशमन उससे माफ़ी मांगने के लिए तरसेगें...
दुशमन १-ऎ माफी मांग...।
दुश्मन २- अरे मर गई अब क्या माफी...
दुश्मन १- बोला ना माफी मांग...।
दुश्मन २- तेरे लिए....ज़
दोनों मिलकर- ऎ सॉरी यार... ।
भूमिका-टीचर्स उसे ग्रेट स्टूड़ंट कहेंगें...
टीचर- लाखों में एक थी हमारी नीतू बिटिया... अरे बहुत ही गज़ब की पढ़ाई करती थी... नीतू.. हम तो उसके पूरे खानदान को जानते थे.. गज़ब का खानदान था उसका.. बताओ मर गई।
उसकी मौत पर स्कूल बंद कर दिये जाएगें.. देश में छुट्टी का एलान होगा.. प्रधान मंत्री राष्ट्र्पति तक उसके लिए शोक सभा आयोजित करेंगें.... ।
नेता- नीतू हमारे देश का भविष्य थी... हाँ गौरव थी...।
और फिर वह एक दिन वापिस आ जाएगा..। उसके सारे दोस्त खुशी के मारे चिल्ला भी नहीं पाएगें.... और वह कहेगी...
नीतू- शू..शू...अब मैं आ गई हूं ना... बस..”
(और नीतू आशिर्वाद की मुद्रा में एक हाथ उठा देती है...तभी रोमा उठती है...।)
रोमा- अबे क्या था यह सब....????
भूमिका- ये रोमा है. इसे लगता है एक दिन bruce lee की आत्मा इसके अंदर आ जायेगी
(रोमा ब्रूसली की तरह बहुत तेज़ चिल्लाकर एक कराटे की मुद्रा बनाती है।)
और तब ये बद्ला लेगी, उस्से जिसने इसकी पेंसिल चोरी की थी, उस्से जिसने इसका boyfreind छीना था. उस्से जिसने उसकी शिक़ायत टीचर से की थी, असल मे वो सबसे बद्ला लेना चाहती थी।
भूमिका- ये पिंकी है, यह बापू को अपना सच्चा दोस्त मानती है.. क्योंकि क्लास में इससे और कोई बात ही नहीं करता...।
पिंकी- सारी बापू..... फिर लेट हो गई।
भूमिका- ये प्रत्युश है, भारत मे कवियों की बुरी हालत के चलते इसका कविता सुनाने का तरीका थोड़ा बदल गया है...
प्रत्युश- अबे उठो... कविता सुनों...
(सभी मना करते है कविता सुनाने से.... वह डॉली को इशारा करता है।)
डॉली- अबे चुपचाप कविता सुनों वरना एक रापटा दूंगी ना खीच करके...
नीतू- हाँ एक रापटा दूंगी ना खीच कर के.......।
प्रत्युश- फूल ने कहा खुशबू से.......
(सभी चिल्ला देते है... वाह!!! क्या बात है... प्रत्युश नाराज़ हो जाता है।)
प्रत्युश- अबे.. अभी शुरु भी नहीं किये थे हम.....
Scene-4
(द्रुपत तेज़ी से चलते हुए क्लास में आता हैं.... सारे बच्चे खड़े हो जाते हैं...। वह बैठने का इशारा करते हैं...।)
द्रुपद- इस कक्षा में.. यह कविता अव्वल आई है... पर उसने अपना नाम नहीं लिखा.... यह किसकी कविता है?
डॉली- सर प्रत्युश...
द्रुपद- तुमने लाल पेंसिल से लिखी थी कविता?
प्रत्युश- नहीं सर.. मैंने तो पेंन से लिखी थी कविता.. जैसा कि आपने कहा था....।
(द्रुपद सबसे पूछता है... पिंकी अपना हाथ उठा चुकी होती है.. पर कोई भी ध्यान नहीं देता... द्रुपद चिल्लाता है... सभी अपना सिर नीचे कर लेते हैं.... तब द्रुपद की निग़ाह पिंकी पर जाती है...। )
द्रुपद- ऎ क्या है.. फिर शू शू... जाओ जल्दी जाओ और जल्दी आना....। तो बताओ किसने लिखी है कविता????
पिंकी- सर यह कविता मैंने लिखी है....
द्रुपद- अच्छा मतलब यह पूरी कविता तुमने लिखी है...?
रोमा- सर झूठ बोल रही है...।
द्रुपद- जानता हूँ....अच्छा तो सुनाओ.. मैं देखता हूँ.. एक भी गलती हुई तो तुम्हारी खैर नहीं..... सुनाओ...
पिंकी- बस्ते में भर दूं यह किताबें...
मिट्टी से ढ़क दूं यह किताबें...
बंद करके रख दूं यह किताबें...
दिखने में छोटी हैं, पर पढ़ने में मोटी हैं...
काश कभी ऎसा हो जाए...
पन्नों पर बारिश गिर जाए..
टप-टप अक्षर बहते जाए...
मैं बूंद-बूंद रख लूंगी...
जब जी चाहे तैरुंगीं...
जब जी चाहे पी लूंगी...
(द्रुपद देखता रह जाता है। सभी बच्चे हैरान होते हैं.....)
रोमा- पिंकी... तू मेरी दोस्त बन जा यार....
(सभी उससे दोस्ती करना चाहते हैं.... प्रत्युश नाराज़ हो जाता है वह ज़बर्दस्ती अपनी कविता सुनाना लगता है..)
प्रत्युश- किताबों के मेले हैं.. फिर भी हम अकेले हैं... यूं एक भी किताब जीवन में नहीं है.. पर जीवन को देखो तो वह असल में एक किताब है....।
द्रुपद- तुम चुप रहो.. चुप.. एकदम चुप...।
(प्रत्युश चुप हो जाता है...)
डॉली- अबे बहुत लाऊड़ कर दिया यार...
द्रुपद- पिंकी यह कविता सच् में तुमने लिखी है? तुम्हारी माँ ने तो नहीं लिखी???
पिंकी- मेरी माँ को तो पता भी नहीं है...।
द्रुपद- तुम झूठ तो नहीं बोल रही हो...?
रोमा- सर!!!
द्रुपद- बहुत अच्छी कविता लिखी है तुमने.. सुनो अब कल ही तुम्हें अगली प्रतियोगिता के लिए दूसरी कविता लिखनी हैं....और उस प्रतियोगिता का विषय है... ’परिवार...’।
प्रत्युश- एक परिवार था... भूख थी, दर्द था संग यह विचार था....
(तभी प्रत्युश की निगाह द्रुपद पर पड़ती है.. और वह चुप हो जाता है.... )
डॉली- अबे इस बार कतई साफ्ट कर दिया यार..।
द्रुपद- पिंकी तुम लिखो.. परिवार.. ।
(..द्रुपद जाने लगता है।)
नंदु- सर आप रो रहे हैं.....
(द्रुपद कोई जवाब नहीं दे पाता और चला जाता है..।)
पिंकी- (रोमा से..) तू सच में मेरी दोस्त बनेगी????
(रोमा के साथ बाक़ी लोग भी हां बोलते हैं.. प्रत्युश और उसका गुट पिंकी के नए दोस्तों को धमकाने लगते हैं...। पर वह बहुत ज़्यादा है तो वह उनपर हावी हो जाते हैं... प्रत्यश हारने लगता है... तभी क्लास की घंटी बजती है... सभी चले जाते हैं... पिंकी क्लास में अकेली रह जाती है..)
पिंकी- बापू... मज़ा आ रहा है... हा-हा... बापू... यह सब मुझसे दोस्ती करना चाहते हैं... सभी... बापू कमाल हो गया.. कमाल....। यही तो चाहिए था मुझे.. हा-हा... बापू कमाल का गिफ्ट दिया है आपने मुझे यह “लाल पेंसिल...”। यह झूठ है मैं जानती हूँ... बस अब नहीं लिखूंगी.. जो चाहिए था वह मिल गया.. मैं इस पेंसिल को चपरासी को दे दूंगी... और माँ को सब सच-सच बता दूंगी......promise..
(तभी प्रत्युश.. अंदर आता है)
प्रत्युश- ए पिंकी..... क्या सच सच बता देगी.
(पिंकी डर जाती है।)
प्रत्युश- किससे बात कर रही थी....?
पिंकी- बापू से....
प्रत्युश- हा..हा हा.... बापू से...? अरे बापू तो सिर्फ फोटो में हैं सही में थोड़ी है.. वह तो कब के मर चुके.. इतिहास नहीं पढ़ा तूने...?
पिंकी- पढ़ा है...।
प्रत्युश- सुन... मैं तेरा पक्का दोस्त हूँ... हे ना...?
पिंकी- पहले भी तूने बोला था कि तू पक्का दोस्त है... पर तूने मेरी शिक़ायत कर दी थी सर से... कितनी पिटाई हुई थी।
प्रत्युश- अरे तब तो मैं छोटा था बहुत... पक्के दोस्त का मतलब थोड़ी पता था मुझे तब...। जो पक्का दोस्त होता है वह कभी किसी को कुछ नहीं बताता....।
पिंकी- तू सच में मेरा पक्का दोस्त है...?
प्रत्युश- हाँ पागल.. झूठ थोड़ी बोल रहा हूँ मैं....।
पिंकी- तो चल साथ में लंच करते हैं...।
प्रत्युश- अरे नहीं...
पिंकी- नहीं...
प्रत्युश- अच्छा ठीक है एक शर्त पर.. पहले बता कि यह कविता किसने लिखी है...?
पिंकी- मैंने लिखी है...
(पिंकी डर जाती है...)
प्रत्युश- अरे चल.. बोल किसने लिखी है कविता...
पिंकी- मैने लिखी है....
(पिंकी भाग जाती है डर के मारे...)
प्रत्युश- अरे सुन.. सुन .. पिंकी... अरे सच्चे दोस्त को ऎसे छोड़कर जाते हैं क्या? पागल... क्या बापू.. अब आपको भी पता चल गया ना कि इसने कविता नहीं लिखी है.. झूठ बोल रही है.. हे ना...।
(सभी चिल्लाते हैं... ’ऎ..’ प्रत्युश के मुँह से डर के मारे ’बापू’ निकलता है...)
Black out…
Scene-5
(चपरासी भीतर आता है और वह पिंकी को देखता है.. वह उसे आवाज़ लगता है.. पिंकी उछलती कूदती भीतर आती है...।)
चपरासी-ऎ पिंकी... इधर आ... वाह!! वाह!! क्या बात है बहुत चहक रही है आज...?
पिंकी- आज का दिन जादूई था अंकल.. एक दिन में सब कुछ उलट पलट हो गया।
चपरासी-अरे क्या पलट गया.?
पिंकी- कुछ नहीं पलटा अंकल.. पूरी क्लास को मेरा नाम पता चल गया.. मेरे बहुत सारे दोस्त बन गए... मैं अपनी क्लास में फेमस हो गई...।
चपरासी-यह सब कैसे हो गया...??
पिंकी- असल में यह लाल पेंसिल ने...... नहीं.. नहीं... मैंने.. मैंने एक कविता लिखी थी जो क्लास में प्रथम आई.....।
चपरासी-तुम कविताए भी लिख लेती हो???
पिंकी- ऎसे ही कभी कभी अपने विचारों को.... आआअ... ओह हो छोडो....।
चपरासी-अब तो तुम प्रथम आई हो.. तो कभी-कभी क्यों.. हर कभी लिखा करो।
पिंकी- नहीं.. नहीं.... मुझे ना यह पेंसिल पड़ी मिली थी... आप इसे कहीं फेंक देना...।
चपरासी-ठीक है फेंक दूंगा...
(चपरासी पेंसिल लेता है और जाने लगता है.... पिंकी उसे रोकती है।)
पिंकी- अंकल रुको...
(वह पेंसिल लेती है.. उसे कुछ देर देखती है... फिर वापिस चपरासी को दे देती है..।)
पिंकी- ले लो.. और इसे दूर फेंक देना.. बहुत दूर.. एकदम दूर... ठीक है..
चपरासी-ठीक है .. फेंक देता हूँ.....
(चपरासी जाने लगता है... पिंकी फिर उसको रोकती है...।)
चपरासी-अरे मेरी माँ फेंक दूंगा बहुत दूर... पर तू कम से कम.. वह कविता ही सुना दे जो प्रथम आई है..।
पिंकी- अरे अभी नहीं.. अभी टाईम नहीं है.. अभी मैं बहुत खुश हूँ... हा.. हा....
(पिंकी चली जाती है। चपरासी कुछ देर लाल पेंसिल को देखता रहता है...।)
Black out…
Scene-6
(माँ पिंकी के कमरे में पूजा कर रही है... पिंकी अंदर आती है...।)
पिंकी- अरे माँ आप मेरे कमरे में यह क्या कर रहे हो...?
माँ- यही तो वह कमरा है.. जहाँ मैंने तुम्हें कविता लिखना सिखाया था...।
पिंकी- अरे माँ आपको कैसे पता...?
माँ- अरे सब पता है मुझे.. तू बैठ इधर... बैठ.. आँखें बंद.. हाथ जोड़... हे भगवान... कितने बड़े-बड़े शब्द.. कितना दिमाग़ खर्च हुआ होगा इसका.. कितनी सुंदर कविता लिखी है मेरी बेटी ने....
पिंकी- माँ... मैं आपसे एक बात कहना चाहती हूँ.. असल में मैंने वह कविता नहीं लिखी है..।
माँ- हे भगवान... देखो.. हर बड़ा कवि यही कहता है.. कि कविता मैंने नहीं लिखी है... वह तो बस लिखा गई..।
पिंकी- माँ आप मेरी बात समझ नहीं रहे हो।
माँ- अरे भगवान क्या मैं इसकी hand writing नहीं पहचानती हूँ...।
पिंकी- माँ वही तो... मैंने ही वह कविता लिखी है.. पर असल में.. नहीं लिखी है..।
माँ- अरे तेरे हिंदी के टीचर आए थे..
पिंकी- कौन द्रुपद सर...
माँ- हाँ.. कितने खुश थे वह.. लेकर आए थे तेरे हाथ की लिखी कविता अपने साथ.. बाप रे मैं तो विश्वास ही नहीं कर पाई...
पिंकी- पर माँ.. असल में...
माँ- चल तू यह प्रसाद खा...
पिंकी- माँ.. एक बहुत बड़ी समस्या है... मुझे ना.. एक कविता और लिखनी है....
माँ- क्या???? सच में.... रुक मैं तेरे लिये गर्म दूध लेकर आती हूँ...।
पिंकी- अरे माँ सुनो तो.. मैं कविता नहीं लिख सकती....।
(माँ नहीं सुनती है... वह चली जाती है)
पिंकी- हे भगवान क्या लिखूं मैं.... ऊफ... हाँ.. आआआ... सोमवार.. मंगलवार.. बुधवार... गुरुवार.... परिवार......
(पीछॆ मास्क पहने द्रुपद, प्रत्युश, डॉली, मॉ और नीतू दिखते हैं। वह धीरे धीरे पिंकी की तरफ बढ़ते हैं...।)
प्रत्युश – कविता लिखने बैठी हैं पिंकी जी
डॉली- चलिये हम भी देख्ते है कैसे लिखती है कविता
नीतू –अरे उसे ध्यान लगाने दो
द्रुपद- अरे चुप, पिंकी बेटा लिखो कविता, मैं भी नहीं लिख पाया था ऐसी महान कविता
प्रत्युश- तूने ही लिखी थी ना कविता पिंकी?
डॉली – अरे अभी देख फिर लिखेगी
नीतू – एक कवि लिख रहा है और हम उसे देख रहे है.
मॉ- पिंकी बेटा कविता लिखना सिखाय था ना मैंने याद है ना.
द्रुपद – प्रिन्सिपल साब कितने खुश है तुमसे....वाह!!!!
प्रत्युश – क्या हुआ कुछ लिखा क्या????
डॉली- लिख रही है.... लिख रही है।
द्रुपद- अरे चुप... उसे लिखने दो
मॉ – कैसे कवि जैसे दिखने लगी है
नीतू – लिख लिया।
डॉली – चलो कुछ तो लिखा....
प्रत्युश – सुनाओ
डॉली – सुनाओ
नीतू – सुनाओ
मॉ – सुनाओ
द्रुपद – सुनाओ पिंकी, अपनी महान कविता सुनाओ..
(पिंकी पढ़ना चालू करती है... )
पिंकी- एक था परिवार...... पापा नहीं थे सोमवार... मम्मी थी मंगलवार... बुध को हुई मैं बीमार...
(इसपर सभी हंसने लगते हैं.....।)
प्रत्युश – अबे अख़बार पढ़ रही है क्या पिंकी?
नीतू- अरे इसे तो कविता लिखना ही नही आता...
(द्रुपद लाल पेन्सिल उठाता है)
द्रुपद – ये क्या है पिंकी
पिंकी – लाल पेन्सिल, यह तो चपरासी के पास थी.. उसने तो इसे बहुत दूर फेंक दिया था.. फिर यह यहाँ कैसे आ गई.. और ये इतनी बडी कैसे हो गयी?
(पिंकी पलटती है।)
माँ– ले ले... ले ले.... लिख ले
डॉली- हां हां ले ले वरना कुछ भी नही लिखायेगा
पिंकी- मुझे नहीं लिखना इस लाल पेंसिल से...
माँ- तो कैसे लिखेगी कविता...?
पिंकी- मैं नहीं लिखूंगी कविता..।
डॉली- तो सब दोस्त.. दुश्मन हो जाएगें.... सब तेरा नाम भूल जाएगें।
पिंकी- मुझे लाल पेंसिल से डर लग रहा है।
माँ- जब जब यह लाल पेंसिल कविता लिखेगी...
डॉली- तब तब यह बड़ी होती जाएगी....।
माँ- यह तेरी दोस्त है...।
डॉली- सच्ची दोस्त....
सभी- यह ले...
पिंकी- आआआआआआआअ....
(इसमें द्रुपद के हाथ में बड़ी हो चुकी लाल पेंसिल है जिसे वह उछालता रहता है.... और नीतू और प्रत्युश को उसे एक चक्कर में घुमाते रहते हैं। पिंकी अंत में चिल्लाकर बिस्तर में अपना चहरा डर के मारे छुपा लेती है।)
Black out…
Scene-7
सारे बच्चे अलग अलग count पर उठते हैं मानों सर ने उन्हें उठाया है या वह कुछ पूछने के लिए उठे हैं...। यह सब पपेट की तरह होता है... फिर अचानक उन्हें समझ में आता है कि वह पपेट हैं.... उनके दोनों हाथ बिना उनकी इच्छा के उठ जाते हैं... वह उस धागे को देखते हैं जिसके ज़रिये उनके हाथ जुड़े हुए हैं.. वह उस धागे को छू कर देखते हैं... फिर सभी अपने दोनों हाथ ऊपर उठाते हैं और अपने से जुड़े सभी धागों को तोड़ देते हैं...। धागे टूटते ही वह सारे बच्चे गिर जाते हैं.... फिर अचानक उठते हैं.. और कंधे उचकाते हुए... हंसते हुए अपनी नई मिली आज़ादी का मज़ा लेते हैं.. तभी वह सभी एक दूसरे से टकराते हैं.... तो उन्हें पता चलता है कि वह अकेले नहीं है... वह डर जाते हैं.. और अपने हाथ फैलाकर एक दूसरे के करीब आने लगते हैं... करीब आते-आते वह एक दूसरे से चिपक जाते हैं.. इतने एक दूसरे से चिपक जाते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है.. वह सभी चीख़ मारकर एक दूसरे से अलग होते हैं..... और वापिस पपेट बनकर.. फिर से वही खेल शुरु करते है कि मानों उन्हें कोई उठा रहा है.. या वह कुछ पूछ रहे हैं...। तभी द्रुपद क्लास में आता है.. सभी अपने काऊट पर ऊपर नीचे होते रहते हैं..।)
द्रुपद- पिंकी... तुम कविता लाई... प्रिंसिपल सर मंगा रहे हैं।
पिंकी- नहीं सर मैंने कविता नहीं लिखी है।
द्रुपद- क्या तुमने कविता नहीं लिखी.. क्यों.. अरे आज जमा करनी है कविता...
(पिंकी कुछ भी नहीं बोलती है.... द्रुपद पूछता रहता है...)
द्रपद- बंद करो यह... बंद करो...। चलो जाओ..क्लास ख़त्म... जाओ...
(द्रुपद सभी बच्चों को भगा देता है...। पिंकी को रुकने के लिए कहता है..।)
नंदु- सर पर हमारी पीटी की क्लास थी..
रोमा- सर एक ही तो क्लास होती है हमारी पीटी की...
द्रुपद- अरे कभी तुमने निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध को पी.टी. करते हुए देखा है। है!!! कवि हैं वह लोग... । एक कवि लिख नहीं पा रहा है और तुम लोग उससे पी.टी. करवा रहे हो। बेटा पिंकी तुम्हें नहीं मैं तो इन लोगों को डांट रहा हूँ...।(फिर डांटना चालू करता है।) मैंने कभी पी.टी. नहीं की लाईफ मे..... (कुछ बच्चे हंसने लगते हैं।) कौन हंसा... कौन हंसा...। मैं कवि नहीं हो पाया पर मेरे अंदर कवि का दिल है.....। चलो जाओ यहाँ से.. चलो...।
(सभी चले जाते हैं।)
द्रुपद- क्यों नहीं लिखी कविता.. आज जमा करनी है। प्रिंसपल साहब कितने खुश हैं मुझसे... मतलब तुमसे भी... आज कैसे भी कविता लिखनी है... तुम यहीं क्लास में बैठो.. कोई तुम्हें तंग करने नहीं आएगा... आराम से कविता लिखो...ठीक है..।
पिंकी- पर सर.. मुझे कविता लिखनी नहीं आती है.... बहुत मुश्किल काम है...।
द्रुपद- आसान होता तो मैं क्या सबसे बड़ी प्रतियोगिता में पैंतिस्वें स्थान पर आता?... लिखों.... मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा इंतज़ार करता हूँ.... जैसे ही कविता खत्म हो जाए मुझे आवाज़ लगा देना... मैं तुरंत अंदर आ जाऊंगा.. आराम से बैठकर कविता लिखो... ठीक है... मैं बाहर हूँ....
(द्रुपद चला जाता है.. पिंकी अकेली बैठी रहती है...। उसे समझ में नहीं आता कि कैसे लिखे...। तभी बाहर से लुड़कती हुई लाल पेंसिल भीतर आती है...। पिंकी डर जाती है....। वह उसे उठाती है... अपनी डेस्क पर आती है और लाल पेंसिल से लिखना शुरु करती है..... तेज़-तेज़...। पिंकी लिखते लिखते थक जाती है और बेहोश हो जाती है। कुछ वक़्फे के बाद... रोमा कहती है ’पिंकी..’ और उठकर पिंकी के बगल में बैठ जाती है.... फिर सोनू, पीहु और भूमिका भी आकर पिंकी के बगल में बैठ जाते हैं...।)
प्रत्युश- तो भईया फिर एक सपना शुरु होता है...
नंदू- किसका सपना?
डॉली- अरे यार प्रत्युश... बोला था इसे अपनी टीम में नहीं लेते हैं...
नंदू- अच्छा मैं समझ गया.. पिंकी का... फिर..
प्रत्युश- हाँ फिर... पिंकी के सपने में.....
नंदू- बापू आए... हे ना..
डॉली- अरे यार... इसके सिक्के में चव्वनी कम है..।
नीतू- सुन.. बापू नहीं आए.. एक बूढ़ा आदमी आया.. जो बापू के जैसा दिखता था... ठीक है..।
प्रत्युश- तुम्हीं सब बोल दो.... बोलो?
डॉली- सॉरी भाई.. बोलो..
प्रत्युश- तो... बापू... एक नदी के किनारे बैठे हुए थे।
डॉली- कवि है यार तू... मैं भी बोलू.. तभी उन्हें एक नाव दिखी.. लाल रंग की नाव..
नीतू- मैं भी बोलू... जिसमें एक लड़की बेहोश पड़ी हुई थी.... कैसा है यह...?
नंदू- हट... यह तो पिंकी है.... सो रही है क्या?
डॉली- अरे यह पिंकी है.. लाल रंग की नाव वाली....।
नंदू- अच्छा!! यह पिंकी है लाल रंग की नाव वाली तो... मैं नदी किनारे बैठा हूँ...।
(नंदू उठकर आगे बैठ जाता है।)
सभी- अबे तू....।
(रोमा अचानक नंदू को बापू कहने लगती है.. नंदू चौंक पड़ता है..।)
रोमा- बापू...
नंदू- हें.... मैं.....
रोमा- बापू...
नंदू- बोलो बेटी क्या बात है??
(नंदू को हंसी आ जाती है... । पीछे से डॉली, नीतू और प्रत्युश भी हंसने लगते हैं..।)
रोमा- बापू यह तो सब उल्टा हो गया...
नंदू- मुझे तो सब सीधा दिख रहा है...
(नंदू को फिर हंसी आ जाती है... पर तब तक वह बापू के बैठने की मुद्रा बना चुका होता है।)
सोनू- बापू... बापू..
नंदू- क्या है..?
(नंदू.. बापू हो जाता है।)
सोनू- बापू सीधा कुछ भी नहीं है... बहुत टेंशन है.. वह द्रुपद बाहर दरवाज़े पर खड़ा है कविता के लिए.. और यह पेंसिल है कि मेरे हाथ से छूट ही नहीं रही हैं....।
नंदू- तो कविता तो लिख दी ना तुमने...
पीहु- बापू सभी लिखवाना चाहते हैं मुझसे .. माफी.. मैंने आपका promise तोड़ दिया.. पर सच में मैं नहीं लिखना चाहती थी....।
नंदू- नहीं.. जो तुम चाहती थी.. वही हुआ है..।
भूमिका- मैं सब बदल दूंगी..।
नंदू- तो बदल दो..
रोमा- मैं इस पेंसिल को जला दूंगी... तोड़ डालूंगी... कहीं गाड़ कर आ जाऊंगी...।
नंदू- तुम्हें तो सब पता है.. तो कर दो...
सोनू- कर दू ना बापू???
नंदू- जो सही लगे वही करो...।
पीहु- यही सही है बापू.. मैं यही करुंगी...।
(इसी बीच पीछे गांधी का शेड़ो उभर आता है... डॉली प्रत्युश और नीतू... घबराकर नंदू के पास खिसक आते हैं... डॉली नंदू को एक चपत लगाती है...।)
डॉली- अबे नंदू.. क्या कर रहा था बे...
प्रत्युश- हाँ बे... डरा दिया तूने बे...
नीतू- अबे यह पिंकी का सपना है तू क्यों इतना सीरियस हो रहा है..।
(नंदू की कुछ समझ में नहीं आता कि उसे क्या हुआ था... तभी बाहर से द्रुपद की आवाज़ आती है.. पिंकी झटके से उठती है.. और सपना टूट जाता है.. सभी अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं...।)
द्रुपद – पिंकी बेटा कविता लिख ली? पिंकी? मैं अंदर आ जाऊं...??
(पिंकी झटके से उठती है.. वह उस बड़ी सी पेंसिल को अपने हाथ में लेती है.. कुछ फैसला करके.. अपनी कविता को वहीं छोड़कर चली जाती है... द्रुपद भीतर आता है।)
द्रुपद- वाह यही हैं बडे कवि के लक्षण, कविता खतम हुई और कवि निकल लिया, वाह क्या कविता लिखी है..वाह वाह…
बच्चे – सर, आप रो रहे है?
द्रुपद – कौन है ?
(द्रुपद वापिस कविता पढ़ने लगता है......)
Black out….
Scene-8
डॉली – प्रत्युश यार.. तू जो कविता लिखता है ना.. बहुत सही है….मेरी समझ में ज्यादा नहीं आती…पर दिल को छूती जाती है!
नीतू – अरे निराला जी की कविता किसको समझ में आती है..पर वो फेमस है ना..
डॉली – निराला….भवानी प्रसाद मिश्र , मुक्तिबोध और फिर अपना प्रत्युश… कवि है यार तू..
प्रत्युश – अरे छोडो यार जाने दो..
नीतू – अरे नही यार, वो कल की छोकरी, सही नही है, दाल में कु्छ काला है…
(तभी तीन लड़कीयां खड़ी होती है.. तीनों पिंकी की भूमिका में हैं....)
डॉली- हॉ यार वो कैसे लिख सकती है..
प्रत्युश- वो किसी से लिखवाती है मैं कह रहा हूँ ना....
(तीनों पिंकी अलग अलग... पूछती है तीनों से... फिर तीनों अपनी अपनी पिंकी से संवाद करते हैं)
पिंकी – क्या कहा? (प्रत्युश से...)
पिंकी2- क्या कहा? (डॉली से..)
पिंकी3- क्या कहा? (नीतू से..)
प्रत्युश – आज पता कर ही लेते हैं..क्यों पिंकी जी, लिख ली कविता, कहां, किस्से लिखवाई?
नीतू- हाँ बोलो कव्यत्री...???
डॉली- आजकल तो कोई भी कविताएं लिख लेता है.. क्यों? बहुत कविताए लिख रही हो पिंकी जी...।
(तभी बीच में बैठा नंदू... बड़ी सी लाल पेंसिल उठाता है और पूछता है।)
नंदू– ए ये लाल पेन्सिल किसकी है?
(तीनों पिंकी चीखती हैं! और दूर जाकर बैठ जाती है... उनकी चीख़ सुनकर प्रत्युश, डॉली और नीतू भी अलग अलग जगह छुप जाते हैं।)
नंदू- क्या हुआ यार...क्या हुआ...???
डॉली- चुप कर...
(भूमिका और रोमा अचानक खड़े हो जाते हैं.. जो इस चीख़ के बाद जानना चाहते हैं कि क्या हो रहा है...?)
पिंकी- यह पेंसिल तो पीछे ही पड़ गई है..
पिंकी२- यह तो मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही है...
(वक़्फा....)
रोमा- ओ तेरी क्या हुआ बे?
भूमिका- कुछ समझ में नहीं आया यार.. ओए छोटू... ओए छोटू.
नंदू- मेरा नाम छोटू नहीं है...
रोमा- अबे.. बता ना क्या हुआ बे...
नंदू- मुझे नहीं पता यार.. ।
पिंकी- ऎ.. यह लाल पेंसिल यहाँ कैसे आई...??
पिंकी2- तुम तो इसे जलाने वाली थी ना...?
पिंकी3- हाँ.. मैंने इसे जला दिया था...।
रोमा- फिर...
भूमिका- फिर...
पिंकी3- जली नहीं...
पिंखी2- हाँ यार जली नहीं...
रोमा- फिर क्या हुआ..
भूमिका- फिर क्या हुआ..
पिंकी2- तोड़ा-मरोड़ा...
पिंखी3- टूटी नहीं इसे कुछ भी नहीं हुआ....
रोमा- तो फिर क्या हुआ...
भूमिका- तो फिर क्या हुआ...
पिंकी- गाड़ दिया था...
पिंकी2- हाँ.. गहरा गढ़ा खोदकर...
पिंकी3- नीचे बहुत नीचे दबा दिया था।
पिंकी- ऎ!! यह पेंसिल तुम्हारे पास कैसे आई...।
नंदु- अरे मुझे क्या पता मुझे तो पड़ी मिली थी...
(और नंदु पेंसिल को अपने सामने पटक देता है...।)
डॉली- प्रत्युश भाई..प्रत्युश भाई...
प्रत्यश- अबे बहुत टेंशन है छुपे रह...।
डॉली- मैं तो कह रही थी.. लाल पेंसिल को लपक लो...
प्रत्युश- हाँ सही है.. उठा लेते हैं.... सुन तू उठा ले लाल पेंसिल...
डॉली- ना. ना.. मैं नहीं.. ओए नीतू.... तू जा... उठा ले..
नीतू- ना.. मैं तो ऎसी चीज़ो को हाथ भी नहीं लगाती..।
प्रत्युश- अरे डरपोक हो तुम दोनों..
डॉली- अरे तो प्रत्युश.. तू ही उठा ले ना....
नीतू- हाँ आप ही उठा लो....
(प्रत्युश, नीतू और डॉली.. तीनो पेंसिल उठाने जाते हैं... जैसे ही पेंसिल के पास पहुंचते हैं... नंदू चीख़ देता है.. वह तीनों भी डर के मारे वापिस छुप जाते हैं।)
नंदू- आआआआआआ.. अरे वह हिली थी. हिली थी...।
(नंदू भागकर पीछे चला जाता है...।)
प्रत्युश- अबे बहुत डॆंजर है बे.. बाद में देखते हैं.. अभी निकलो यहाँ से... और तुझे तो बाद में देख लूंगा पिंकी... समझी...।
डॉली- हाँ बाद में देख लेंगे...
नीतू- हाँ.. बाद में देख लेंगे....।
(तीनों चले जाते हैं... भूमिका और रोमा... पेंसिल की तरफ देखते हैं.. और धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ना चालू करते हैं.... जैसे ही पेंसिल के पास पहुंचते हैं.... उन्हें पेंसिल हिलती हुई दिखती है दोनों चीख़ मारकर पीछे भाग जाते हैं...।)
भूमिका- वह हिली थी. वह हिली थी....।
रोमा- हाँ... मैंने देखा.. वह हिली थी...।
(अब सिर्फ तीनों पिंकी बचते हैं... और बीच में बड़ी सी लाल पेंसिल रखी होती है...। तीनों पिंकी धीरे-धीरे उठती है.... पिंकी धीरे से पेंसिल की तरफ जाती है उसे उठाती है.. और वह पेंसिल उसे नचाना चालू करती है.. पीछे दोनों पिंकी भी काल्पनिक पेंसिल को लिए झटके खाती रहती है...।)
Black out…
Scene-9
(पीछे शेड़ो में बहुत बड़ी लाल पेंसिल दिखयी देती है.... और वह बोलने लगती है... दूसरी तरफ शेड़ो में पिंकी के अलग-अलग डरे हुए शेड़ो बदलते रहते हैं..)
लाल पेंसिल-हेलो पिंकी कैसी हो??? तुम्हें मज़ा आ रहा है ना...।
(पिंकी की चीखने की आवाज़ आती है...)
लाल पेंसिल-डरो मत पिंकी... मैं तुम्हारी ही इच्छा हूँ तुम्हारी desire.. तुम्हारी चाह.. देखों तुम्हारे साथ-साथ मैं भी कितनी बड़ी होती जा रही हूँ....।इतनी आसानी से तुम मुझसे छुटकारा नहीं पा सकती... यह तो अभी शुरुआत है पिंकी.. तुम तो बस ऎश करो.. और देखो मैं कैसे तुम्हें ऎश करवाती हूँ....।
(लाल पेंसिल अचानक पिंकी की तरफ बढ़ने लगती है... पिंकी का शेड़ो डर के मारे गायब हो जाता है।)
Black out…
Scene-10
(down stage.. एक तरफ एक जूता लटका हुआ है..। सारे बच्चे पूरे नाटक में सिर्फ एक ही जूता पहने हुए हैं.... एक पेर खाली है..।..। सारे बच्चे पीछे लेटे हुए है..। सभी अपना सिर उठाते हैं एक साथ... जूते को देखते हैं....)
सोनू- यह खेल क्या है?
नंदू- इसके नियम किसने बनाए हैं?
भूमिका-क्या हम सब किसी एक ही आदमी के लिए खलते हैं?
पीहु- जो लगातार जीत रहा होता है?
नीतू- वह जीता कर करता क्या है?
रोमा- फिर वह वापिस हमारे जैसा क्यों दिखना चाहता है?
प्रत्युश- अगर हमें पूरी ज़िदग़ी एक ही जूता पहनना है तो हमें दूसरे जूते का सपना क्यों आता है?
डॉली- अबे तो खेलना ज़रुरी है क्या....?
सभी- हाँ....।
(...रेंगते हुए.. उस जूते की तरफ जाते हैं... सभी एक दूसरे को खींचते है.. और आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं.....। इसमें ’संघर्ष जीतने का’ बहुत ज़रुरी है..। जो भी कोई पहले जूते को छू लेता है वह जीत जाता है.. वह उस जूते को निकालता है... सभी चुप-चाप उसे देखते हैं..। और तभी अचानक पूरा दृश्य स्लो-मोशन में बदल जाता है... जीता हुआ व्यक्ति स्टेज के एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ, अपनी जीत का जश्न मनाता हुआ बढ़ता है...। बाक़ी जो हार चुके हैं वह ज़मीन पर पड़े रोने लगते हैं... यह सब कुछ बहुत ही धीमी गति में होता है.. वह कोसते हैं.. अपने एक पैर को जिसमें एक जूता नहीं है.. भगवान को, खुद को....। वह जो जीता है.. वह स्टेज के दूसरी तरफ पहुंचता है और वहा से एक छुपाया हुआ बेग़ निकालता है जिसमें बहुत सारे एक पैर के जूते रखे हैं..... वह उस बेग़ में एक और जीता हुआ जूता डाल देता है...। बाक़ी बच्चे... बार बार कभी अपने एक पैर को, जिसमें जूता नहीं है.. और कभी उस बेग़ को देखते हैं जिसमें जूते ही जूते हैं...। तभी द्रुपद भीतर प्रवेश करता है..। सारे लोग अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं।)
द्रुपद- आप लोगों को जानकर बहुत खुशी होगी कि पूरे स्कूल में मेरी कक्षा की पिंकी प्रथम आई है.... आ जाओ पिंकी... अंदर आ जाओ...।
(पिंकी के गले में मेड़िल है.. पीछे बड़ी सी पेंसिल फसी हुई है.. वह झुकी हुई चल रही है।)
द्रुपद- अरे खड़े हो....।
(सभी खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं... पिंकी पीछे अपनी जगह बैठने जाती है... द्रुपद उसे आगे बैठने को कहते हैं।)
द्रुपद- अरे पीछे कहाँ पिंकी तुम्हारी जगह अब यहाँ है.. तुम यहाँ बैठोगी अब से....। (प्रत्युश से....)चलों तुम पीछे जाओ... आओ पिंकी...। अब जो सारे स्कूलो के बीच जो प्रतियोगिता होगी वह बहुत कठिन है... बहुत बड़े कवी डॉ. रमेश उसे जज करने आने वाले हैं.... मैं खुद उस प्रतियोगिता में तीस्वें स्थान पर आया था...
नंदु- सर पिछली बार तो आप चालीस्वें स्थान पर आए थे...?
द्रुपद- चुप... तो मैं खुद इस प्रतियोगिता में अठाईस्वें स्थान पर आया था। पूरे शहर के सारे स्टूड़ेन्ड... इसमें भाग लेते हैं... विषय भी उसी वक़्त मिलता है.. पिंकी इसमें तुम जीत सकती हो... इस कविता को पढ़्ने के बाद् मुझे लगा कि सच में तुम जीत सकती हो....सुनो.. पिंकी की कविता...
परियों के भी लोक से सुन्दर, छोटा सा प्यारा मेरा घर
सपने जो भी रहते मेरे, कुछ सीधे कुछ टेड़े-मेड़े
हर रात मेरी आँखों से चुराकर, अपनी आँखों में बंद कर लेते
पापा मेरे, उन सारे सपनों को, सोने का बनाकर वापस कर देते
बिठा के काँधे पे मुझको, वो आसमान की सैर कराते
चलते चलते जब थक जाऊं, झट से वो घोडा बन जाते
माँ तो मेरी, थाली में हर दिन मेरी खुशियाँ लाती है
जितने भी निवाले खा लूँ मैं, भूख बढती ही जाती है...
(जब द्रुपद इसे पढ़ता है तो धीरे-धीरे लाईट जाती है और पीछे ख़ड़ी उसकी माँ पर लाईट आती है....। माँ भी चुपचाप कविता सुनती है.. द्रुपद कविता खत्म करता है....)
माँ- पापा घोड़ा बन जाते??? पिंकी... यह तो झूठ है...। तुमने झूठ लिखा है?
(माँ पर से लाईट जाती है... सिर्फ पिंकी पर लाईट रह जाती है... वह बापू को देखती है... बापू की तस्वीर पर लाईट आती है।)
पिंकी- बापू... मुझे कुछ नहीं चाहिए.. मैं बस सोना चाहती हूँ....। इस झूठ ने मेरी नींद उड़ा दी है... बापू... लाल पेंसिल मेरा पीछा नहीं छोड़ रही है.. जहाँ जाती हूँ वहां पहुंच जाती है...। मैं क्या करुं...??? मुझे बहुत डर लग रहा है.. मुझे नहीं चाहिए यह सब... मुझे कुछ भी नहीं चाहिए.....।
द्रुपद- पिंकी..पिंकी.. अरे कहां जा रही हो.. पिंकी..
(द्रुपद पिंकी के पीछे जाता है... सभी पहले द्रुपद को देखते हैं फिर पिंकी जिस मेडिल को फेंक कर चली गई है.. उसे देखते है... धीरे-धीरे लेटते हैं... इसी बीच प्रत्युश, डॉली और नीतू... पिंकी के पीछे भाग लेते हैं। बाकी लोग वापिस से competition शुरु करते हैं...। चपरासी आकर घंटी बजाता है।)
Black out..
Scene-11
(पिंकी अकेली बैठी है.. पीछे से चपरासी बहुत से... पेपर लेकर आता है और बिछाने लगता है। उसकी निग़ाह पिंकी पर पड़ती है।)
चपरासी-अरे पिंकी घर नहीं गई तुम अभी तक...?
पिंकी- ना...
चपरासी-क्यों स्कूल में ही सोना है क्या..?
पिंकी- अंकल मैं कई रातों से सोई नहीं हूँ...
चपरासी-कवि कोई गहरी कविता तो नहीं सोच रहा है..? अरे तेरा खुशी का टाईम खत्म हो गया है क्या? चल कोई कविता ही सुना दे अपनी....?
पिंकी- कविता नहीं अंकल समस्या है.. मेरी एक दोस्त बहुत समस्या में है.. वह असल में मेरी बेस्ट फ्रेंड है... उसने ना एक झूठ बोला...
(इसी बीच प्रत्युश, डॉली और नीतू.. पीछे से छुपते हए आते हैं .. और छुपे रहते हैं।)
चपरासी-क्या झूठ...
पिंकी- वह जाने दो..
चपरासी-फिर क्या हुआ?
पिंकी- फिर वह ना.. उस झूठ में बुरी फस गई..
चपरासी-कैसे?
पिंकी- लोग उस झूठ को सच मानने लगे.. जब की वह कहना चाहती है अब कि.. वह झूठ था... पर उसका सच कोई सुनने को ही तैयार नहीं...
चपरासी-मतलब जो झूठ था वह सच हो गया है.. और अब जो सच है.. वह झूठ हो रहा है...यह तो बहुत बड़ी समस्या है..।
पिंकी- झूठ अब बहुत बड़ा हो गया है... और भारी भी...अब बताओ मेरी बेस्ट फ्रेंड को क्या करना चाहिए..
चपरासी-तुम्हारी बस्ट फ्रेंड का नाम पिंकी है क्या..?
पिंकी- अंकल...
चपरासी-अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था...मेरे ख़्याल से तुम्हारी दोस्त को...
पिंकी- हाँ मेरी दोस्त को क्या???
चपरासी-मेरे ख़्याल से तुम्हारी दोस्त को अपने किसी पक्के दोस्त के साथ चाय पीनी चाहिए।
पिंकी- चाय...?
चपरासी-हाँ चाय.. कौन है तुम्हारी दोस्त का पक्का दोस्त..?
पिंकी- उसका.. तो... कोई दोस्त नहीं है..
चपरासी-अरे कोई तो होगा..
पिंकी- बस एक बापू हैं...
चपरासी-किसका बापू...?
पिंकी- अरे बापू.. अंकल आपने इतिहास नहीं पढ़ा...?
चपरासी-अरे बस तो आराम से बापू को बिठा और उनके साथ चाय पी... सब सही होगा..।
(चपरासी चला जाता है.. वह बापू से बात करने को होती है कि एक कागज़ उसे आकर लगता है... फिर दूसरा .. फिर तीसरा...।)
प्रत्युश- अब फसी है अकेली...
डॉली- अब नहीं छोड़ेगें बेटा...।
नीतू- अब सब सच-सच बोलना पड़ेगा..।
प्रत्युश- बता किसने लिखी है कविता..?
नीतू- तेरे बस की तो है नहीं...
डॉली- अरे बोल..
प्रत्युश- पापा लिखते हैं?
डॉली- अरे मम्मी से लिखवाती होगी...
नीतू- जब तक बोलेगी नहीं.. तब तक नहीं छोड़एगे तेरेको...।
सभी- बोल.. बोल... बोल....
प्रत्युश- रुको... उठो... तो कवियत्री जी.. अब बताओगी कि और पिटना है...
(तभी पीछे से रोमा आ जाती है।)
रोमा- ऎ....
(रोमा... आती है पिंकी पीछे चली जाती है...। रोमा तीनों के बीच में आकर बुरी तरह चिल्लाकर कराटे की एक मुद्रा बनाती है... तीनो डार जाते है.... फिर तीनो कराटॆ की मुद्रा बनाने की कोशिश करते हैं।)
प्रत्युश- हमें भी तो आता है कराटे...।
डॉली- हाँ हाँ हमने भी क्लासेज़ की हैं।
नीतू- मेरे पास तो यलो बेल्ट भी है..।
(तभी रोमा कराटे के कुछ दाव करती है..और खड़ी हो जाती है....। तीनों अपना पेर उठाकर चिल्लने लगते हैं...। रोमा सबको चुप होने को कहती है...।)
रोमा- चुप... पिंकी... पिंकी..
(पर पिंकी वहा नहीं है...)
रोमा- अरे पिंकी कहाँ चली गई।
तीनों- हम देखकर आते हैं....
Black out…


Scene-12
पीछे शेड़ो में पिंकी जाती हुई दिखती है.. तभी पीछे से लाल पेंसिल उसके पीछे-पीछे चल रही होती है...। पिंकी रुककर उसको देखती है... वह भी रुक जाती है.. पिंकी फिर चलना शुरु करती.. लाल पेंसिल भी उसके पीछे-पीछे चलने लगती है...। तभी सामने गांधी जी का शेडो आता है.. और पिंकी गांधी जी से बात करती है.. पीछे लाल पेंसिल का भी शेड़ो है....।)
बापू- पिंकी...।
पिंकी- बापू...
बापू- क्या बात है...?
पिंकी- बापू... आप चाय पीते हैं?
बापू- तुम्हारे साथ पी लूंगा...
पिंकी- बापू मैं ना बुरी फसी हूँ...
बापू- कैसे?
पिंकी- आप तो जानते हैं कि मैंने कविताएं नहीं लिखी हैं... पर अब कोई मेरी बात का यक़ीन ही नहीं कर रहा है... और यह पेंसिल है कि सब झूठ लिखती ही चली जा रही है...
बापू- और झूठ बड़ा होता जा रहा है...
पिंकी- बड़ा नहीं बापू बहुत बड़ा.. अब मैं कुछ भी करुं यह झूठ पीछा ही नहीं छोड रह है.. मैं सो भी नहीं पा रही हूँ... मैं क्या करुं...?
बापू- सच बोलो.... बस..
पिंकी- मैं कहना चाहती हूँ पर कोई सुनना ही नहीं चाहता...।
बापू- किसी से नहीं.. अपने से.. खुद से सच कहो... पहले खुद सुनों फिर सब सुन लेंगे..।
पिंकी- पर मैं कह तो रही हूँ...
बापू- तुम्हारा झूठ तुम्हारी कविताओं में है... हे ना?
पिंकी- हाँ....।
बापू- तो बस वहाँ सच बोलो...।
पिंकी- पर मैं कविता नहीं लिख सकती....।
बापू- जब झूठ लिख सकती हो तो सच लिखना तो आसान ही है....
पिंकी- सच क्या लिखूं?
बापू- अब वह तुम जानों...।
पिकी- बापू... मैं सच लिखूंगी...
बापू- चाय का क्या हुआ?
पिंकी- लाती हूँ.... लाती हूँ..।
Black out..
Scene-13
(कविता की अंतिम प्रतियोगिता है। पीछे मास्क पहने चार जज हैं... जिसमे एक डॉ रमेश हैं। सामने सारे लोग मास्क पहने लिखने की मुद्रा में बैठे हैं...। पिंकी ने मास्क नहीं पहना है..।)
जज१- मुख्य अतिथी डॉ रमेश का स्वागत है।
रमेश- मेरा सोभाग्य।
जज२- भविष्य के कवि हमारे सामने बैठे हैं।
रमेश- मेरा सौभाग्य।
जज३- अंतिम और निर्णायक प्रतियोगिता है...।
जज१- सफल कवि बड़ा कवि होगा..।
जज२- चुनाव रमेश जी करेगें..।
रमेश- मेरा सौभाग्य...।
जज३- तो कवियों आप लोग तैयार हो?
(सारे लोग अपनी मुद्रा बदलकर लिखने को तैयार हो जाते हैं।)
जज१- रमेश जी कविता का विषय बताएं...।
रमेश- मेरा सौभाग्य.
जज२- रमेश जी... विषय .. विषय बताना है...
रमेश- हाँ.. मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी होती है कि....
जज१- तो आज की कविता का विषय है.... ’खुशी... happiness’
(सारे लोग तुरंत लिखना शुरु करते हैं। और लिखते लिखते लोगों की (happiness के साऊंड़...) आवाज़े सुनाई देती हैं...। सारे जज भी अपनी मुद्राए बदलते रहते हैं....। सारे लिखना बंद करके अपने-अपने कागज़ो को हवा में उठाते हैं... जज ताली बजाकर समय समाप्ति की घोषणा करते हैं। फ्रीज़....। पिंकी अपना कागज़ नीचे करती है।)
पिंकी- मेरी इच्छा थी कि मैं किसी ओर की तरह दिखूं... कुछ ओर बन जाऊं...। लाल पेंसिल ने वह कर दिया.. उसने एक दूसरी पिंकी पैदा कर दी..। वह पिंकी बड़ी होती जा रही थी...। हां बड़ी... बहुत बड़ी.. मैं उसमें गुमने लगी थी...।... पर मैं वह नहीं हूँ.... लाल पेंसिल मेरी नहीं है.. मैं सिर्फ पिंकी हूँ जिसे कविता लिखना नहीं आता है।
(पिंकी के इस संवाद के बीच में पीछे शेड़ो में पेंसिल टूटती है..। जज आकर सबके कागज़ लेते हैं। सारे कागज़ रमेश जी को देते हैं... रमेश सबको रिजक्ट कर देता है.. और एक कागज़ पर थोड़ा सा हंसता है। और वह काग़ज़ जज१ को देता है...। जज१ कहता है..)
जज१- अरे यह तो कोई रमेश ही जीता है...।
(बच्चों में से एक बच्चा अपना हाथ उठाता है.. बाक़ी सारे लोग अपना सिर झुका लेते हैं....फ्रीज़...)
पिंकी- बापू मुझे नींद आ रही है... मैं सोना चाहती हूँ.. मुझे बहुत तेज़ नींद आ रही है।
(पिंकी सोने लगती है... और सारे बच्चे अपना सिर उठाकर पिंकी को देखते है..सोता हुआ...। फिर सभी अपना मास्क उतारते हैं... और लेट जाते हैं...। सभी embryo की मुद्रा में वापिस लेट जाते हैं...। नाटक फिर शुरु से शुरु होता है.... तभी लाल पेंसिल गिरती है....नंदू झटके से उठता है.. बाक़ी लोग नाटक की शुरुआत दौहराते हैं। वह लाल पेंसिल को उठाता है .. सबसे पूछता है कि यह किसकी है...? जब उसे कोई जवाब नहीं मिलता तो वह... उस पेंसिल को अपने देखता है और फिर आश्चर्य से दर्शकों की तरफ देखता है कि वह इस लाल पेंसिल का क्या करे....। तब तक सभी नाटक की शुरुआत का एक अंश पूराकर लेते हैं...( embryo से पैदा होने तक का).... धीरे धीरे लाईट जाती है... अंधेरा।)
Black out….


end

बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012

पीले स्कूटर वाला आदमी....




पीले स्कूटर वाला आदमी



लाल अपनी डेस्क पर टाईप्राईटर पर बैठे हुए कुछ टाईप कर रहा है... तभी वह कुछ सोचकर लिखना बंद करता है... हमें संगीत सुनाई देता है... और एक लड़की ’नील..’ उसके पीछे से नाचती हुई बाहर आती है... लाल उसे नाचता हुआ देखता है और लिखना भूल जाता है... तभी उसे पीछे से पीताम्बर आता दिखता है.. और वह सीधा लाल की आंखों में देखता है.. लाल उसे देखता रह जाता है... नील नाच रही होती है...।
ब्लैक आऊट।
जब लाइट आती है तो पीताम्बर लाल की जगह बैठा है और लाल नील के साथ नाच रहा है होता है...।
ब्लैक आउट
लाइट आती है तो हम देखते है कि पीताम्बर लिखना शुरु करता है। नील जा चुकी है, लाल अकेला नाच रहा है। वह नाचते-नाचते पीताम्बर को देखता है... पीताम्बर लिखना बंद करके लाल की तरफ देखता है...। लाल शर्मिंदा हो जाता है और धीरे से पलंग पर लेट जाता है... सो जाता है।
ब्लैक आऊट...
जैसे ही लाइट आती है, हमें डोर-बेल सुनाई देती है। लाल के पिताजी अन्दर आते है। वे अपनी पेटी नीचे रखते हैं और लाल के सर पर हाथ फेरते है, लाल चौंक कर उठ जाता है।
लाल : आप !
पिता : मैंने कहा था मैं साढ़े सात बजे आऊँगा।
लाल : (पैर पड़ता है) मैं सो रहा था।
पिता : कैसी तबीयत है तुम्हारी ?
लाल : ठीक है।
पिता : फिर जोडिस हो गया ?
लाल : फिर मतलब ? बचपन में होता था, अब हुआ है और अब तो लगभग ठीक भी हो गया है।
पिता : मैंने तुम्हें मना किया था।
लाल : अरे मैने स्कूटर नही बेचा, बस सौदा तय कर रहा था। पर वो
घटिया स्कूटर कोई खरीदना ही नहीं चाहता।
पिता : स्कूटर बेचने के बारे में तुमने सोचा ही क्यों ?
लाल : क्यों? सोचने से पीलिया हो जाता है क्या ?
पिता : तुम्हें हो सकता है।
लाल : पता है। (दोनों दर्शकों से)
जब मैं छोटा था, मुझे पीलिया हो गया था।
पिता : दो बार !
लाल : हाँ हाँ दो बार। खूब झाड़-फूँक कराई गई।
पिता : मेरे पिताजी इसको लेकर गाँव-गाँव भटके थे।
लाल : गाँव-गाँव, सिर्फ दो गाँव भटके नहीं थे, गए थे। तब एक बाबा ने ताबीज पहनाया और कहा कि इक्कीस दिन में इसका पीलिया उतर जाएगा और.....
पिता : और इसकी कोई भी चीज जो इस सबसे ज़्यादा पसन्द हो उसे पीले रंग की होना चाहिए। अगर नही है तो उसे पीला करा दो, तो हम इसे गोद में लेकर पूरे घर में भटके और पूछा कि बताओ तुम्हारी सबसे पसंदीदा चीज कौन-सी है।
लाल : मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी, मैंने अपनी उँगली सीधे स्कूटर पर रख दी।
पिता : और मेरे स्कूटर को पीला कराया गया।
लाल : और पीलिया के डर के चक्कर में आज तक उसे साथ लेकर घूम रहा हूँ, मुझे पीलिया का डर नहीं है... इनका वहम है। हर लेटर में पूछते है, वो स्कूटर ठीक है ना, सर्विसिंग कराई, तीन महीने हो गए......
पिता : तुम्हारा हेलमेट किस रंग का है?
(कुछ शांति...)

पिता : (लाल से) मेरा लेटर मिला तुम्हें ?
लाल : हाँ कुछ दिन पहले मिला था !
पिता : पढ़ा ?
लाल : स्कूटर सर्विसिंग पर दे दिया है ।
पिता : स्कूटर की सविसिंग के लिए लेटर नही लिखा था। मै कल आ रहा हूँ तुमसे मिलने।
लाल : पता है। आपने लेटर में ऊपर ही लिखा है। 7:30AM आ रहा हूँ।
पिता : इसलिए क्योंकि मुझे पता है कि तुम मेरा लेटर कभी खोलकर पढ़ते नहीं। पैसों की ज़रुरत है ?
लाल : नहीं।
पिता : काम कैसा चल रहा है ?
लाल : काम नहीं कर रहा हूँ। दो महीने से छुट्टी ले रखी है।
पिता : जो हो गया उसे भूल जाओ।
लाल : कोशिश कर रहा हूँ। पर आज-कल ये फाँस बहुत दर्द करती है।
पिता : किससे बदला ले रहे हो, मुझसे कि अपने आपसे।
लाल : में कहानी लिख रहा हूँ।
पिता : जिस कहानी का तुम्हें अन्त नहीं पता उसे क्यों लिखना चाहते हो ?
लाल : मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं।
पिता : क्या पूछना चाहते हो?
लाल : आपने इंदिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को क्यों नहीं दी?
पिता : तुम इसका जवाब जानते हो...।
लाल : हाँ..... मैं जानता हूँ, पर मुझे ये नहीं पता कि वो सही है या ग़लत।
पिता : तुम क्यों इस कहानी के पीछे पड़े हो ? तुम कुछ दूसरा नही लिख सकते ?
लाल : मैं लिख रहा हूँ। एक बूढ़े की कहानी लिख रहा हूँ, वो बूढ़ा मेरे घर के सामने की बिल्डिंग की सातवीं मंजिल की बालकनी पर दिन भर बैठा रहता है। मै उसकी कहानी भी लिख रहा हूँ पर ............
पिता : पर क्या ?
लाल : मेरी कहानी का हर पात्र पीला स्कूटर क्यों चलाता है ?
पिता : तुम पीले स्कूटर को भूल क्यों नही जाते हो ?
लाल : मैं तो उसे अपनी ज़िन्दगी से निकाल देना चाहता हूँ।
पिता : ऐसा मत करना।
लाल : क्यों, आपको डर है पीलिया से मेरी मौत हो जाएगी ?
पिता : हाँ।
लाल : ऐसे कोई नही मरता।
पिता : तुम्हारे दादाजी ने सख़्त मना किया था।
लाल : ठीक है, मैं इसे ज़िन्दगी भर अपने पास रखूँगा, पर एक शर्त है। मुझे कहानी का अन्त बता दीजिए।
पिता : तुम डरे हुए हो, तुम अन्त जानना ही नहीं चाहते।
लाल : मै जानना चाहता हूँ।
पिता : देखो कई चीज़ें ज़िन्दगी में गणित के सवाल की तरह होती है, जिन्हें अगर आपको हल करना हो तो आपको ‘माना कि....’ से शुरुआत करनी पड़ती है। तुम्हारी दि़क्कत ये है कि तुम्हें इसका अन्त मानना पड़ेगा। माना कि अन्त ये है, इसलिए कहानी ये है।
लाल : ठीक है कम से कम इतना तो बता दीजिए कि आपने इन्दिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को क्यों नहीं दी ?
पिता : देखो वो तो मैं खुद तुमसे .....(जाने लगता है)
लाल : कहाँ जा रहे हैं आप ?
पिता : बाथरुम (लाल सो जाता है) मेरे पास एक कुदाली है जिससे मैं सफे़द भविष्य के पहाड़ को काटता जा रहा हूँ और उसकी मिट्टी पीछे ढकेल रहा हूँ। पीछे अतीत का बड़ा-सा पहाड़ इकठ्ठा होता जा रहा है। हर बार अपना कुदाल चलाने पर भी ढेर सारा सफ़ेद भविष्य सामने है और पीछे हर कुदाल के वार का ढेर सारा अतीत। अतीत के पहाड़ पर घांस उग आई है वो हरा-भरा हो गया है। सारी घटनाएँ जो जीते वक़्त कड़वी लगती थीं वो अतीत के पहाड़ पर जाकर घना पेड़ बन गई है, जो अब छाया देता है। कई कहानियाँ अतीत में बिना अन्त लिये आती हें। अन्त भी उस कहानी के साथ ही घटता है... लेकिन आप ऐन उस वक़्त पर वहाँ मौजूद नहीं होते या आप बहुत छोटो होते है, या वो अन्त कहीं बहुत डरावना न हो इस शंका में आप उसे जानना ही नहीं चाहते। ऐसी कहानियाँ बड़ा-सा पत्थर बनकर अतीत के पहाड़ पर जम जाती है, जिसे आप पूरी ज़िन्दगी ढोते रहते है।
(पिता चले जाते है। ब्लैक आउट होता है और फिर लाइट आती है शाम का समय है। लाल रात भर साया, दिन भर सोया, बीच में 7:30AM को उसकी आँख खुली थी, जिसका ज़िक्र बाद में पीताम्बर भी करता है और वो फिर सो जाता है लाल अजीब सी बैचेनी महसूस करता है। वो पिताजी का अन्तिम लेटर उठाकर देखता है जो अभी तक खुला नहीं है, बाकी कई लेटर खुले हुए इधर-उधर बिखरे पड़े है। लाल भीतर चाय बनाने जाता है। चाय लेकर बाल्कनी में आकर खड़ा हो जाता है। पीताम्बर लिखना बन्द करता है।)
पीताम्बर : रात होने के ठीक पहले मेरी आँख खुल गई.......तो देखा पिछली रात से पूरे दिन तक मैं सोता रहा .......इस बीच मेरी आँख खुली थी......सुबह 7:30 बजे .....फिर सो गया, अब सर भारी हो रहा था, सब कुछ बड़ा अजीब-सा लग रहा था। खुद को कोसने लगा, क्या कर रहा हूँ? क्या हो रहा है मेरे साथ? वैसे भी पिछले दो महीने से मैं कुछ कर नहीं रहा था। पर, एक पूरा दिन वो भी पिछली रात के साथ सोते हुए बिता देना। मैं सोच रहा था वो सभी एक दिन में कितना आगे बढ़ गए होंगे जो परसों तक मेरे साथ थे। उठकर पानी पिया, कुछ समझ में नही आया तो चाय चढ़ाने रख दी। अब मैं पूरी रात कैसे बिताऊँगा ? नींद का आना वैसे भी रात के साथ आपके सम्बन्ध पर निर्भर करता है ... खैर मैंने चाय छानी और बाल्कनी में आकर खड़ा हो गया, पूरा शहर मेरी बाल्कनी से नही दिखता था। (बूढ़ा आदमी बाल्कनी से इशारा करता है और फिर चला जाता है।) बस सामने की दो ऊँची बिल्डिंग और उनके बीच से मुझे शहर की चौड़ी सड़क हाईवे दिखती थी। मुझे इस बाल्कनी से इतनी-सी दुनिया देखने की आदत पड़ गई थी, सो जब भी देखता था घण्टों वहीं खड़ा रह जाता था। वो इतनी-सी दुनिया मुझे पूरी तरह सम्मोहित कर लेती थी...-हर बार। असल में ये बिल्डिंग, ये चौड़ी सड़क, सामने के घर, ये सब मेरे घर के अन्दर का ही हिस्सा थे... बाहर बोलकर मैं इन्हें बाहर करने की कोशिश ज़रुर करता था पर मैं खड़ा रहा। काफ़ी देर, चाय आधी पी चुका था, आधी ठण्डी हो चुकी थी-फिर भी पिए जा रहा था। पिताजी के लगभग सारे ख़तों का जवाब मैं लिख चुका था, सिवाय उनके अन्तिम लेटर के। (डोर बेल बजती है..)तभी बेल सुनाई दी, डोरबेल। मैं मुड़ा नहीं, (डोर बेल फिर बजती है..) वो फिर सुनाई दी। मुझे हँसी आने लगी, वो फिर आ गए। ये वो ही हैं, असल में मेरे घर में डोरबेल थी ही नहीं।
(लाल जाता है, पीताम्बर उसे दरवाज़ा खोलने से रोकता है। उसके सामने जाकर खड़ा हो जाता है। बाहर से आवाज़ आती है।)
नील : दरवाज़ा खोला।
पीताम्बर : नहीं .........
नील : क्या हुआ ? आज भी कुछ ठान लिया है। दरवाज़ा खोलो।
लाल : आज..... मैं सोच रहा था कि तुम आज.........
नील : मत सोचो, तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं है। दरवाज़ा खोलो।
लाल : ज़िद मर करो।
(पीताम्बर लाल के सामने से हट जाता है)
नील : मैं ज़िद नही कर रही हूँ और अगर तुम देर करोगे तो मै चली जाऊँगी पर कोई और आएगा जिसे तुम्हें सहना पड़ेगा। बोलो जाऊँ या तुम्हें बचाऊँ ?
लाल : (दरवाजा खोलता है, वो अन्दर आ जाती है, दर्शकों से) पता नही क्या हुआ, पर मैंने दरवाज़ा खोल दिया। अगर आपको पता हो कि दूसरी तरफ़ कौन है तो दरवाज़ा खोलना आसान हो जाता है। तो आसान काम मैंने कर दिया। वो अन्दर आ चुकी है।
(लाल उसके सामने जाकर बैठ जाता है.. पीताम्बर को यह बिल्कुल ठीक नहीं लगता है।)
नील : कपड़े उतारुँ ?
लाल : नही।
नील : अधिकतर तो तुम कपड़े उतरवाते ही हो इसलिए पूछ लिया।
लाल : नहीं आज नही ।
नील : क्यों, आज क्यों नही ? सोमवार को तुम्हारा उपवास होता है क्या ?
(नील उसके सामने से उठती है और पलंग पर लेट जाती है।)
लाल : (दर्शकों से) लोग झूठ बोलते हैं कि समय अपनी रफ़्तार से चलता है। ना..... असल में समय बहुत बुरी तरह थमता है और बहुत तेज़ चलता है। समय के अपने खाली घेरे होते हैं, इन घेरों का अपना अलग समय और अपनी अलग रफ़्तार होती है।
नील : तुम अपने समय से नाराज़ हो ।
लाल : तुम कितनी देर यहाँ रुकोगी ?
नील : तुम बताओ।
लाल : क्यों तुम कुछ तय करके नही आई हो ?
नील : आई थी।
लाल : फिर ?
नील : तुम्हारे ऊपर है।
लाल : क्या ?
नील : तुम्हें पता है।
लाल : देखो तुम मुझे डराती हो।
नील : बचाती भी तो हूँ।
लाल : मै बचना नही चाहता।
नील : वो तो मैं पहले ही कह रही थी कि बचो मत।
लाल : तुम जाना चाहती हो।
नील : मैं तो आना भी नहीं चाहती थी।
लाल : देखो आज मैंने तुम्हें नही बुलाया है।
नील : क्या ? ज़रा फिर से कहना।
लाल : मुझे कुछ देर के लिए अकला छोड़ोगी ?
नील : तुम अकेले ही हो।
लाल : कितना अच्छा लगता है तुम्हें ये बोलना।
नील : ये छोडो, इसका जवाब दो, एक नदी में छोटी-सी नाव पे एक भैंस खड़ी हैं, वो नाव डूबनेवाली है। मतलब अगर उस नाव में एक कंकड़ भी डालो तो वो डूब जाएगी। तभी भैंस गोबर कर देती है, बताओ नाव डूबेगी कि नहीं ?
लाल : मेरे ख़्याल से नाव .....तुम कुछ देर चुप रहोगी ।
नील : फँस गए ना।
लाल : मैं फँस चुका हूँ...मुझे लिखना है।
नील : तुम्हें किसी की ज़रुरत है।
लाल : तुम्हारी नहीं इतना जानता हूँ।
नील : जब ज़रुरत हो तो बुलाना मत मै खुद आऊँगी। इससे तुम्हें इतनी तो संतुष्टि मिलेगी कि तुमने नही बुलाया है।
लाल : (नील चली जाती है) देर तक सोते रहने से ‘क्यों’ जैसे कई सवाल उठे हैं, इन सारे सवालों का मेरे पास एक ही जवाब है। सो जाता हूँ।
पीताम्बर : तुम सो नही सकते ।
लाल : क्यों ?
पीताम्बर : तुम्हें कहानी लिखना है।
लाल : तुम कौन हो ?
पीताम्बर : देखो तुम ये नही जानना चाहते जो तुम पूछ रहे हो।
लाल : हाँ......तो मैं क्या चाहता हूँ ?
पीताम्बर : तुम्हारे पास बहुत सारे सवाल हैं ?
लाल : हाँ, मरे पास बहुत सारे सवाल हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम रोज़ कहाँ जाते हो ?
पीताम्बर : तुम रोज़ मुझे क्यों देखते हो ?
लाल : तब मेरा चाय पीने का वक़्त होता है और मै तुम्हें रोज़ अपनी बाल्कनी से जाता हुआ देखता हूँ।
पीताम्बर : मैं भी तुम्हें कई दिनों से मुझे देखते हुए देख रहा हूँ।
लाल : तुम हाईवे पर रुककर मुझे क्यों देखते हो ?
पीताम्बर : तुम बाल्कनी में खड़े होकर मुझे क्यों देखते हो ?
(चुप्पी) तुम्हें अपने बाप से प्रॉब्लम है ना ?
लाल : क्यों ?
पीताम्बर : क्योंकि वो तुम्हारी माँ के साथ सोता था।
लाल : (चुप्पी/दर्शकों से) सभी अपने-अपनी तरीके से रात के साथ सोते है, हर आदमी का रात के अँधरे के साथ अपना सम्बन्ध होता है। यह सम्बन्ध अगर अच्छा है, तो आपको नींद आ जाती है और अगर ये सम्बन्ध खराब है तो आपके जीवन के छोटे-छोटे अँधेरे, रात के अँधेरे में घुस आते हैं और आपको सोने नहीं देते ।
पीताम्बर : तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ना ?
लाल : हाँ मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
पीताम्बर : मैं भीड़ में खो जाने से डरता हूँ। मै हमेशा भीड़ का हिस्सा बनने से डरता हूँ। इसलिए मैने बहुत सारे चुटकुले, जोक्स याद कर लिये है। हमेशा लगातार सबके सामने सुनाता रहता हूँ....लाल,पीली,नीली,हरी शर्ट पहनता हूँ, रोज़ शेव करता हूँ, जब भी घबराता हूँ, बाथरुम चला जाता हूँ। दो अलग-अलग किस्म के अख़बार रोज घर से याद करके निकलता हूँ ज़्यादा चीजे़ं पता नही होती पर किसी भी विषय पर लगभग एक घण्टे बोल सकता हूँ और हाँ.... मै पीला स्कूटर चलाता हूँ।
लाल : चुप क्यों हो गए ....बोलो।
पीताम्बर : क्यों दूसरों की कहानी में अपना सुख ढूँढ़ रहे हो ?
लाल : नहीं....मै सुनना चाहता हूँ।
पीताम्बर : किसके बारे मे ?
लाल : तुम जानते हो।
पीताम्बर : कहानी शुरु करें ?
लाल : हाँ (डोरबेल बजती है) अरे मुझे पिताजी को लेने स्टेशन जाना था, मै भूल ही गया।
(पिताजी अन्दर आते हैं। दोनों पैर छूते हैं।)
पिताजी : खुश रहो अगर रह सको तो।
लाल : मैं आने ही वाला था आपको स्टेशन पर लेने।
पिताजी : उसकी कोई ज़रुरत नहीं है .....कैसा लग रहा हूँ मैं?
लाल : अच्छे।
पिताजी : तुम्हारा मुँह क्यों लटका हुआ है ? (खुद से) बहुत गैस बन रही है।
लाल : कहाँ जा रहे हैं ?
पिताजी : बाथरुम, क्यों तुम्हें प्रॉब्लम है ? (अन्दर से) ये क्या हाल बना रखा है बाथरुम का (चुप्पी)
पीताम्बर : तुम्हें अपने बाप से प्रॉब्लम है ना ?
लाल : चुप रहो ।
पीताम्बर : क्योंकि वो तुम्हारी माँ को छोड़कर चले गए थे। फिर भी बार-बार उनसे मिलने आते थे क्यों ? शायद उनके साथ सोने ....तुम्हें पैसे देकर चॉकलेट लेने भेजते थे। माँ उनके लगातार आने के डर से चल बसी। तुमसे मिलने की जिद्द क्यों करते हैं .... तुमसे क्यों मिलना चाहते हैं ?
(पिताजी भीतर से वापिस आते हैं... दोनों सचेत हो जाते हैं... पिताजी धीरे से अपनी पेंट की जेब में हाथ डालते हैं... और कुछ चॉक्लेटस निकालते हैं)
पिताजी : चॉकलेट खाओगे ?
लाल : आप यहाँ कितने दिन रुकेंगे ?
पिताजी : तुम कहो तो मै अभी जा सकता हूँ।
लाल : चाय पीएँगें ?
पिताजी : तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया ? क्या कर रहे हो आजकल ?
लाल : कुछ नहीं।
पिताजी : सुना है तुमने कोई जॉब ज्वाइन कर लिया है ?
लाल : कर लिया था। पिछले दो महीने से छुट्टी ले रखी है।
पिताजी : क्यों मेरे मरने का शोक मना रहे हो। लिखना क्यो छोड़ दिया ?
लाल : मै लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।
पिताजी : किसकी कहानी लिख रहे हो?
लाल : एक बूढ़े की। वो बूढ़ा .....
(डोरबेल बजती है। लाल दरवाजे़ की ओर मुड़ता है।)
पिताजी : क्या हुआ ? मेरा आखि़री लेटर अब तक क्यो नहीं खोला ? (बूढ़े आदमी का प्रवेश और प्रस्थान) मुझसे बात नहीं करना चाहते। जब बात करने की इच्छा हो तो बुला लेना। मैं इन्तजार करुँगा।
(पिताजी का प्रस्थान..)
लाल : आओ ...अन्दर आ जाओं
बूढ़ा आदमी : मुझसे कोई ग़लती हो गई क्या ?
लाल : नही कोई ग़लती नहीं।
बूढ़ा आदमी : आज तुमने मेरी तरफ एक बार भी नही देखा।
लाल : मै अभी तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था।
बूढ़ा आदमी : मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी। मैं बाल्कनी से तुम्हें इशारा भी कर रहा था। सातवीं मंजिल से चलकर आ रहा हूँ। मेरी लिफ्ट भी काम नही कर रही है।
लाल : क्या बात है बोलो .......?
बूढ़ा आदमी : मुझे तुम्हारी चिन्ता हो रही है, मुझे लगता है, तुम्हें भी वही लगता है जो मुझे लगता है पता है मुझे क्या लगता है?, मुझे लगता है कि... कल का दिन सांत्वना है आज के दिन के बीतने की। आज तो बीत गया, जैसे कैसे बीत ही जाएगा ना!!! फिर लगने लगता है कि कल एक जादू की पुड़िया में बंद है, पुड़िया खुलेगी, सूरज उगेगा और सब कुछ वही होगा जो सालों से मैं बाल्कनी में बैठे-बैठे सोच रहा हूँ.... पता है आजकल मैं एक बूढ़ी चील को देखता हूँ, वो बहुत बूढ़ी हो चुकी है। वह बस एक पेड़ के ठूठ पर बैठी रहती है, बहुत से जवान कौवे उसे चोंच मारकर भागते हैं। उस चील की एक समस्या है या शायद जवान कौवों का डर, पर उसने अब ऊपर आसमान में उड़ना छोड़ दिया है। उसके पर झड़ते हैं। मै उसके झड़े हुए परों को आजकल इकट्ठा कर रहा हूँ........रोज.... पर वो ऊपर उडेगी ना। मैं उसे एक बार आसमान में ऐसे गोल गोल ऊपर उड़ते हुए देखना चाहता हूँ।
(लाल ना में सिर हिलाता है.... बूढ़ा आदमी नाराज़ हो जाता है... और गुस्से में चला जाता है।)
लाल : ये एक दिन सातवीं मंज़िल से कूदकर अपनी जान देगा।
पीताम्बर : तुम इसे बचा सकते हो।
लाल : नही.... क्योंकि चील अब इतना ऊपर नही उड़ सकती।
पीताम्बर : चाहो तो बचा सकते हो। बस कहानी का अन्त बदल दो। जाने दो....तुम बहुत थक गए हो।
लाल : मैं थका नही हूँ ........मैं बस सोना चाहता हूँ।
पीताम्बर : नही तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो।
लाल : हाँ, मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं.. मैं पूछना चाहता हूँ कि... इंन्दिरा गांधी के मरने की ख़बर दादा जी को क्यों नही दी गई ?
पीताम्बर : ये बहुत बड़ा सवाल है - कुछ दूसरा पूछो ?
लाल : तुमने लिखना क्यो छोड़ दिया ?
पीताम्बर : अब मै नही लिख सकता, क्योंकि मुझे हर कहानी में हर पात्र में अपना बाप दिखाई देता है। मेरी हर कहानी मेरी माँ की कहानी होती है। मेरी कहानी का हर आदमी मेरी माँ को डरा रहा होता है और कहानी का अन्त होने से पहले मेरा बाप हँसता है और मुझसे एक ही वाक्य बोलता है।
लाल : ये लो बेटा.. दस रुपए.. जाओं चॉकलेट ले आओं फिर हम स्कूटर पर घूमने जाएँगें।
पीताम्बर : .....और कहानी वहीं रुक जाती है।
लाल : नही, पर अब मुझे दूसरे लोग दिखने लगे है। मैं उस बूढ़े आदमी की कहानी लिख सकता हूँ। (दोनों खड़े हो जाते हैं... पीताम्बर अपनी छोटी सी नोट बुक निकाल लेता है.. दोनों कहानी गढ़ने का सिलसिला शुरु करते हैं.. मानों कहानी लिख रहे हों..।) मैने हमेशा इसे बाल्कनी में धूप सेंकते हुए देखा है।
पीताम्बर : धूप हो या ना हो ये हमेशा धूप सेकता रहता है।
लाल : इसने अपने जीवन में सिर्फ़ चार ठोस चीजें की है।
पीताम्बर : पहली अपनी बेटी की शादी।
लाल : जो घर वापिस आ गई .....पति ने छोड़ दिया।
पीताम्बर : टी.वी. और फ्रिज खरीदा।
लाल : फ्रिज में आजकल बर्फ नहीं जमती है। टी0वी0 बहुत पुराना है इसलिए सिर्फ आठ चैनल ही देखे जा सकते है।
पीताम्बर : तीसरा इसने -
लाल : इसने.. इसने... इसने.... मेरा सिर भारी हो रहा है।
(डोर बेल बजती है)
पीताम्बर : तीसरी और चौथी ठोस चीज क्या है ?
लाल : मुझे पता है पर....
पीताम्बर : तुम बिल्कुल ठीक जा रहे हो बूढ़े के बारे में सोचों।
लाल : मैं बचना चाहता हूँ।
(नील इस वाक्य को सुनते ही तेज़ी से भीतर चली आती है.... )
नील : देखो तुमने खुद कहा बचना चाहता हूँ, बोलो बचाऊँ ?
लाल : (पीताम्बर से...)उस बूढ़े के पास पीला स्कूटर है, मेरे पास तीसरी ठोस चीज ये है।
पीताम्बर : (पीताम्बर अपनी नोटबुक गुस्से में वापिस अपनी जेब में रख लेता है।) तुम फिर अपने बाप को बीच में घसीट लाए।
नील : बचाऊँ ?
पीताम्बर : (वह फिर कहानी लिखवाने की कोशिश करता है..।) तुम्हें कहानी लिखनी है। इसे छोड़ो बूढ़े के बारे में सोचो।
नील : मेरी तरफ़ देखो, कपड़े उतारुँ ?
पीताम्बर : चौथी ठोस चीज़ क्या है ?
नील : मेरी जरुरत है या मैं जाऊँ ?
लाल : (उसका हाथ अपने हाथ में लेता है.. पीताम्बर उसे रोकने की कोशिश करता है पर लाल उसे झिड़क देता है.। लेकिन झिड़कते ही लाल को अपनी ग़लती का एहसाह होता है। ) रुको - ये गलत है .... जब तक मैं अपनी कहानी नहीं लिखूँगा मै किसी और की कहानी नही लिख सकता-मुझे अपनी कहानी लिखना है ....
नील : तो बूढ़े का क्या होगा? ....मेरा क्या होगा...? मै चली...
लाल : सुनों ......मुझसे बात करो ....
नील : नही मै बात नही कर सकती ...तुम्हें तो मेरी ज़रुरत नही है ...।
लाल : मुझे तुम्हारी ज़रुरत है ....मुझसे बात करो .....।
नील : ठीक है - एक दिन सफेद घोड़े पे सवाल होकर एक राजकुमार आया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क। उसे मुझसे प्यार हो गया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क.. फिर हमारी शादी हो गई तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क, ढेर सारे बच्चे हो गए, तबड़क, तबड़क, तबड़क.....
पीताम्बर : और फिर वो तुम्हें छोड़कर चला गया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क, हमें तुम्हारी कहानी नहीं सुननी है।
नील : अच्छा ठीक है उसी के बारे में बात करुँगी तो तुम सुनना चाहते हो..
(वह पीताम्बर के बग़ल में जाकर खड़ी हो जाती है... और दोनों एक कहानी की शुरुआत करते हैं।)
पीताम्बर : मै पूरी ज़िन्दगी चेहरों के पीछे भागा हूँ।
नील : मै पूरी ज़िन्दगी चेहरों के पीछे भागी हूँ।
पीताम्बर : असल में मैने चौकोर साँस लेना शुरु कर दिया था।
नील : इन चौकोर साँसों के अपने अँधरे कोने हैं- जिनमें बहुत से चेहरे छिपे बैठे हैं- ये एक तरह का चौकोर कुँआ जैसा है जिसमें अगर मैं आव़ाज लगाती हूँ तो मुझे अपनी नहीं किसी दूसरे की आव़ाज गूँजती हुई सुनाई देती है... मैं उस आवाज के पीछे भागती हूँ- वो आवाज चेहरा बन जाता है और मै उससे कहती हूँ ....कपड़े उतारुँ....
पीताम्बर : तुमने फिर अपनी कहानी शुरु कर दी ?
नील : क्यों जब तुमकों हर कहानी में अपना बाप दिखाई देता है तो मै तुम्हारी कहानी में अपनी एक लाइन नहीं जोड़ सकती हूँ।
पीताम्बर : कम-से-कम कपड़े उतारुँ जैसा घटिया शब्द तो मत जोड़ो ....
नील : क्यों जब तुम कहते हो, कपड़े उतारो तो तुम्हें तो बड़ा मज़ा आता है। ये सब छोड़ो .......इसका जवाब दो.....एक नदी में ........छोटी सी नाव में एक भैंस खड़ी है ....वो नाव डूबने वाली है ......मतलब अगर उस नाव में एक कंकड भी डाल दोगे न तो वो डूब जाएगी.....तभी भैंस गोबर कर देती है ....बताओ नाव डूबेगी कि नहीं .....
पीताम्बर : नाव डूबेगी......उत्तर है नाव डूबेगी।
नील : गलत । उत्तर है नाव नहीं डूबेगी क्योंकि गोबर तो भेंस के पेट में ही था अब नाव में है इसलिए नाव नही डूबेगी।
पीताम्बर : नाव डूबेगी - बचपन में भी मेरे लिए नाव डूबती थी और अभी भी मेरे लिए नाव डूबेगी।
(दोनों बाहर निकल जाते हैं, डोरबेल।)
लाल : बहुत पहले मेरी उँगली में एक फाँस गड़ गई थी- वो काफ़ी भीतर तक घुस गई थी-बहुत दर्द हो रहा था खून निकलने लगा था जब मैने उस फाँस को बाहर खींचा तो वो टूट गई- आधी फाँस भीतर ही रह गई-उस वक्त मैं दर्द सहन नही कर पा रहा था-मै डर के मारे डॉक्टर के पास भी नही गया - करीब एक हफ्ते तक वो दर्द रहा फिर कम होने लगा... अब उस दर्द का कम होना मै बर्दाश्त नही कर पा रहा था-मुझे अजीब लगने लगा!!! अब मुझे इसके साथ रहने की आदत पड़ गई थी- करीब दो हफ़्ते बाद जब वो दर्द लगभग खत्म होने लगा तो उस भीतर घुसी हुई फाँस को मैंने और भीतर कर दिया- फिर खून निकला, फिर दर्द होने लगा। (वह उठता है, और बूढ़े के पास जाता है।) अभी तक ये फाँस मेरी उँगली में जमी हुई है। आप इसे देख सकते है।
बूढ़ा आदमी : (बूढ़ा अपनी बाल्कनी समेत लाल के घर में चला आता है। वो अपनी ही बाल्कनी में बैठा हुआ है और लाल बाल्कनी के नीचे खड़े होकर उससे बात कर रहा है। पीताम्बर लाल की बाल्कनी में जाकर खड़ा हो जाता है।) हाँ मै इसे देख सकता हूँ ये अभी तक तुम्हारे पास है।
लाल : हाँ।
बूढ़ा आदमी : क्या चाहते हो ?
लाल : पता नहीं।
बूढ़ा आदमी : तुम्हें पता है -
लाल : दर्द कम हो रहा है ......
बूढ़ा आदमी : तुम्हें दूसरी फाँस की ज़रुरत है-
लाल : अभी नहीं ......(वो फाँस को वापिस भीतर की तरफ दबाता है।)आ.....ऽऽ
(पिता का प्रवेश)
लाल : (पैर पड़ता है) कैसे हैं आप पापा ?
पिता : बहुत बड़ा हो गया है तू।
लाल : पापा मैं आपके जैसा बनना चाहता हूँ.....
पिता : अरे बेटा मेरे जैसा बनने के लिए बहुत कसरत, वर्जिश करनी पड़ेगी- मैं जब मिल्ट्री में था तो बॉक्सिंग करता था....एक दिन रिंग में मैंने अपने सीनियर का कान काट लिया-वो रोता हुआ गया था-बाद में उसने मेरा कोर्ट मार्शल कर दिया.....पर मैं रोया नहीं....उस वक़्त भी मैं मुस्कुराता रहा, तेरा बाप कभी नहीं रोया...
पीताम्बर : आप कभी नही रोये पापा ?
(पीताम्बर, बूढ़े आदमी को पापा कहकर सम्बोधित कर रहा है। यहाँ लाल अपने बाप से बात कर रहा है। ठीक इसी समय बूढ़ा आदमी भी लाल का बाप हो जाता है।)
लाल : मेरे पापा कभी नहीं रोये.....पापा आप रेम्बो को भी बॉक्सिंग में हरा सकते हैं.....
पिता : बेटा बॉडी से कुछ नहीं होता -जिगर होना चाहिए....... जिगर..
पीताम्बर : पापा आप रोते हैं .....
पिता : बहुत दिन से तेरे साथ बॉक्सिंग नहीं लड़ी.....चल...उठ...मार-मार
(दोनों बाक्सिंग खेलना शुरु करते हैं।)
पीताम्बर : जब आपके छोटे भाई की मौत की ख़बर आपको मिली थी तो आपने अपने आपको बाथरुम में क्यों बन्द कर लिया था ?
लाल : चुप।
पीताम्बर : आप बाथरुम में क्या कर रहे थे।
(बाक्सिंग करते करते पिताजी थक जाते हैं।)
पिता : बस-बस-तुम अपनी सेहत का थोड़ा ध्यान रखो बहुत जल्दी थक जाते हो।
पीताम्बर : मैं हमेशा थक जाता था-मैं बहुत जल्दी थक जाता थ।
पिता : चल एक ताश की बाज़ी हो जाए।
पीताम्बर : बहुत छोटे में मुझे चश्मा लग गया था। पापा ने पाँच बार मेरी आँखों का चेकअप करवाया। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके बेटे को भी कभी चश्मा लग सकता है। मैं अपनी आँखों का चेकअप करवा-करवाकर थक गया। मैं हमेशा थक जाता था। मैं बहुत जल्दी थक जाता था।
पिता : फिर हार गया। अब रोना मत, चल एक और बाज़ी खेलते हैं।
पीताम्बर : एक बार स्कूल में मेरे दोस्त से मेरी लड़ाई हो गई। हम दोनों ने एक दूसरे को चाँटा भी नहीं मारा बस मुँह से ढिशुम ढिशुम की आवाज़ निकालते रहे, वो बच्चों जैसी लड़ाई होती हैं ना जिसमें चाँटे घूसे नहीं पड़ते, बस कपड़े गंदे हो जाते हैं,। मेरी पैंट घुटनों पर से फट गया। घर पर पापा ने देख लिया, पूछने लगे किसने मारा ? मैंने कहा-लड़ाई हुई पर मारा किसी-ने-किसी को भी नहीं। उन्हें लगा मैं कुछ छुपा रहा हूँ। वो उसी वक़्त मेरे दोस्त के घर पर गए और उसके पापा को सड़क पर खड़े होकर गालियाँ दीं और जब मेरा दोस्त माफ़ी माँगने आया तो उसे एक चाँटा मार दिया। स्कूल में काफ़ी समय तक मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते रहे... ’ऐ इसे छूना मत, नही तो बदला लेने इसका बाप घर तक आ जाता है।’ ये सुनते-सुनते मैं थक गया था। मैं हमेशा थक जाता था। मैं बहुत जल्दी थक जाता था।
पिता : तू फिर हार गया।
लाल : मुझे ताश खेलना नहीं आता है।
पिता : क्यों ?
लाल : क्योंकि आपने कभी मेरे साथ ताश नहीं खेला है।
पिता : क्योंकि तुझे चश्मा लग गया था ना इसलिए।
लाल : आपने मेरे दोस्त को चाँटा क्यों मारा था। (पिता जाने लगता है) इन्दिरा गांधी के मरने की ख़बर दादाजी को क्यों नहीं दी गई।
पिता : इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।
लाल : आप कहाँ जा रहे हैं ?
पिता : बाथरुम। (प्रस्थान)
पीताम्बर : अजीब-सा बुखार आजकल मैं महसूस करता हूँ। ये बुखार बढ़ता नहीं है, घटता नहीं है, अस रहता है वहीं आपके भीतर।
लाल : देर तक सोते रहने से क्यों जैसे कई सवाल उठे। इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है, क्योंकि मेरी कहानियाँ आधी रह जाती हैं पूरी नहीं हो पाती.....मेरी कहानियाँ....(तभी लाल को कहानी सूझती है... पीताम्बर खुश हो जाता है वह जल्दी से अपनी नोट बुक निकालता है।) मेरी कहानी .......मेरे दादाजी काले थे, मेरे पिता गोरे और मैं बहुत गोरा.....शुरु करो.....
पीताम्बर : (टाइप करते हुए) मेरे दादाजी काले थे, मेरे पिताजी गोरे और मैं बहुत गोरा।
बूढ़ा आदमी : मेरे पिताजी बहुत काले थे - वो कहते थे कि वो रात में पैदा हुए है इसीलिए काले हैं....उन्हें पूरा यकीन था कि यदि वे दिन में पैदा हुए होते तो गोरे होते....मेरी तरह-मेरी माँ काली थी, मेरे पिताजी बहुत काले थे- और मै गोरा था....पर मेरे पिताजी खुश रहते थे क्योंकि उनको ये कारण ही बहुत सही लगता था कि मेरा बेटा सुबह पैदा हुआ है इसलिए रात अपना रंग उस पर नहीं छोड़ पाई-वो बच गया, मेरा बेटा बच गया, देर रात को वह हमेशा उठकर एक बार मेरी तरफ़ देख लेते थे......उन्हें रात में मैं बहुत सुन्दर दिखता था-ये वो मुझे सुबह बताते थे...’कल रात को बहुत सुन्दर लिख रहा था।’
लाल : मैं आपको स्टेशन लेने आपने ही वाला था।
(बाप प्रवेश कर चुका होता है....दोनों पैर पड़ते हैं)
पिता : उसकी क्या ज़रुरत है-क्या मुझे तुम्हारा घर नहीं पता है ?
लाल : किसे ढूँढ रहे हैं ?
बूढ़ा आदमी : मुझे दोपहर का आसमान बहुत अच्छा लगता है-दोपहर का आसमान बहुत शान्त होता है-उसमें छोटे धब्बे सी एक चील मँडराती रहती है, मुझे पता ही नहीं चलता था कि मैंने कब चील को देखना शुरु किया और कब आसमान को देखना छोड़ा...अब चील नहीं उड़ती है...उसके पर झड़ते हैं......चील के पर झड़ना अजीब लगता है ना....? जैसे कोई शेर बूढ़ा हो रहा हो और आपने उसके झड़ते हुए दाँत देख लिये... हा.. हा.. हा....।
लाल : किसे ढूँढ़ रहे है?
पिता : तुम्हारी माँ....तुम्हारी माँ की तस्वीर नहीं लगाई तुमने ?
लाल : नहीं लगाई।
पिता : बेटा अब मैं अकेला नही रह सकता....मुझे किसी की ज़रुरत है.... तुम शादी कर लो.... माफ़ करना....तुम एक छोटी-सी दुकान क्यों नहीं खोल लेते.....अरे आजकल STD-PCO बहुत चलते हैं...और उसके साथ अगर Xerox डाल लो तो पैसा ही पैसा...... तुम अपना लिखते रहना, मैं दुकान सँभालूँगा।
लाल : ये कहानी मुझे अभी पूरी करनी है।
पीताम्बर : फिर क्या हुआ ?
पिता : अपनी माँ के नाम पर रखना STD-PCO और Xerox का नाम .... सावित्री बाई STD-PCO & Xerox अच्छा है ना-
बूढ़ा आदमी : फिर मेरी शादी हुई-सावित्री नाम था लड़की का -मेरे पिताजी ने सिर्फ़ इसलिए उससे मेरी शादी की....क्योंकि वो रात में पैदा हुई थी फिर भी गोरी थी-पिताजी को लगा कितनी भाग्यशाली है, रात में पैदा होकर भी गोरी हैं- बाद में हमें एक लड़का पैदा हुआ .......जिसे पैदा होते ही जॉन्डिस हो गया... पीलिया। (बूढ़ा आदमी लाल की तरफ इशारा करता है।)
पिता : घटनाएँ सालों में बँटी होती है .....साल भी हमें घटनाओं के रुप में ही याद रहते हैं....जिस साल की कोई घटना नहीं, समझो वो साल हमने जिया ही नहीं...और कई घटनाएँ इतनी बड़ी होती है कि जीवन लगती है जिसे हम अलग-अलग तरीके से पूरी जिन्दगी जीते रहते हैं।
बूढ़ा आदमी : ये तब की बात है जब हमारे यहाँ नया-नया टीवी आया था- बहुत कम लोगों के यहाँ टी वी हुआ करता था। उस वक्त सावित्री मुझे भूल चुकी थी- उसे टीवी से प्यार हो गया था .....तक तक मेरे पिताजी बूढ़े हो चुके थे, उन्हें अलग कमरे में शिफ्ट भी कर दिया गया था। तब सिर्फ़ दूरदर्शन हुआ करता था और सैटर्डे-संडे को फिल्म दिखाई जाती थी।
लाल : मुझे फिल्म देखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.....पर मेरे दादाजी- वो फिल्मों के पीछे पागल थे- उनके लिए टीवी चमत्कार था- वो फ़िल्म देखते हुए हँसते थे, रोते थे....वो फिल्म देखते नही थे- वो फिल्म देखना जीते थे। दादाजी की आवाज़ चली गई थी- वो दिन भर में केवल दो-तीन शब्द ही बोल पाते थे.....जैसे पानी-खाना और बोलते ही हाँफने लगते थे-इसलिए वो इन शब्दों का इस्तेमाल बहुत नाप-तौलकर करने थे। मै फिल्म नहीं देखता था, मैं तो बस दादाजी को फिल्म देखते हुए देखता था।
पिता : सैटर्डे-संडे को हमारे यहाँ बहुत भीड़ होती थी, सावित्री के दोस्त आते थे- खासकर संडे को तो मेरा अपने ही घर में घुसना मुश्किल हो जाता था। सावित्री को मेरे पिताजी का फ़िल्म देखना बिल्कुल पसन्द नहीं था.... क्योंकि उनके पूरे शरीर से बदबू आती थी पेशाब की......। सावित्री....पर उसने गलत किया......!!!
लाल : क्या....क्या गलत किया था माँ ने ?
पिता : पूरी दुनिया में इतनी कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं, तुम कुछ भी लिख सकते हो....फिर क्यों अपने आपको तकलीफ़ दे रहे हो ?
लाल : क्योंकि मैं एक ही तकलीफ़ को बार-बार नही जीना चाहता हूँ।
(लाल बाप के सामने चिल्ला देता है.. बाप घबरा जाता है..।)
पिता : मैं जब सपने देखा करता था तो मैं उन कभी उन सपनों को बुला नहीं पाया जिन्हें मैं देखना चाहता था। मेरे सपने बस आते थे और मै उन्हें देख लेता था। मैं अपने सपने में अपने बेटे को कुछ बनाना चाहता था पर वो बना नहीं, वो मेरे सपनों जैसा ही निकला। वो जैसा था वैसा ही मेरे सपने में आ जाता था।
लाल : क्या ग़लम किया माँ ने ?
पिता : देखा ......
(पिता का प्रस्थान)
लाल : सावित्री ने क्या ग़लत किया ?
पीताम्बर : ये तो तुम्हें पता है .... हे ना?
लाल : हाँ...ये तो मुझे पता है- तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो?
पीताम्बर : पता नहीं.... शायद मैं STD-PCO खोलना चाहता था, नहीं खोल पाया इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ। वैसे भी इस देश में आदमी कौन से रंग का स्कूटर चला सकता है.....? पहले तो स्कूटर चलाते ही वो मिडिल क्लास का हो जाता है ....वो हरे रंग का स्कूटर नही चला सकता, वो भगवे कलर का स्कूटर नही चला सकता, वो लाल रंग का स्कूटर नही चला सकता। तो वो कैसे बता सकता है कि मैं किसी का नही हूँ, किसी की तरफ़ नहीं हूँ.....पीला रंग बचा हुआ है इसलिए मैं पीला स्कूटर चलाता हूँ और मै किसी की तरफ़ नही हूँ।
पीताम्बर : बताओं साचित्री ने क्या ग़लत किया ?
लाल : सावित्री ने दादाजी का संडे को टीवी वाले कमरे में आना बन्द करवा दिया......(संगीत)
(पीताम्बर उस संगीत पर टाईप्राईटर पर जाकर बैठ जाता है.. और टाईप करना शुरु कर देता है।)
बूढ़ा आदमी : पिताजी का संडे को फ़िल्म देखना बन्द हो गया था.... बन्द करवा दिया गया.....सावित्री के दोस्त आते थे ना.....मैंने सावित्री को कहा, पिताजी को फिल्म देखना बहुत अच्छा लगता है....वो पूरे हफ्ते इन दो दिनों का इन्तजार करते हैं और शनिवार-इतवार को तो उनसे शाम का समय नहीं कटता है....वो खाना-पीना सब भूल जाते हैं-पर वो नहीं मानी-संडे को उनका आना बन्द करवा दिया गया। पर टीवी की आवाज़ उनके कमरे तक आती थी।
पीताम्बर : हाँ टीवी की आवाज़ उनके कमरे तक आती थी।
लाल : मुझे उस वक्त फ़िल्म देखने का शौक बिलकुल नहीं था, मुझे तो बस दादाजी को फ़िल्म देखते हुए देखना अच्छा लगता था। अब मैं संडे को दादाजी के कमरे में इर्द-गिर्द मँडराता रहता था, अन्दर जाने की हिम्मत नही होती थी- अगर दादाजी ने मुझसे कह दिया कि मुझे दीवी वाले कमरे में ले चलो तो मैं क्या करुँगा...... माँ ने स़ख्त मना किया था... वैसे मुझे माँ का भी उतना डर नहीं था पर असल में दादाजी दिन भर में कुछ ही शब्द बोल पाते थे और मैं उनके पूरे एक वाक्य को ज़ाया होते हुए नही देख सकता था।
पीताम्बर : एक संडे को मुझसे नही रहा गया...मैंने सोचा वहाँ फिल्म चल रही है तो दादाजी इस वक़्त क्या रहे होंगे। सो मैं एक स्टूल लो आया, ऊपर चढ़ा और खिड़ी का पर्दा हटाकर देखा... तो देखता क्या हूँ कि दादाजी अपने पलंग पर लेटे हुए है...उनकी आँखें माथे की तरफ चढ़ी हुई हैं और वो टीवी वाले कमरे की तरफ देखने की कोशिश कर रहे हैं....और चेहरे पर वैसे ही भाव बदल रहे है जैसे वो फ़िल्म देखते हुए बदलते थे ।
वो हँस रहे थे-वो रो रहे थे....वो चुप थे-वो अब फिल्म देखना सुन रहे थे।
बूढ़़ा आदमी : थककर बैठ जाने से पहले नींद आ जाती थी......पर अब बैठे-बैठे थकना तो होता है पर नींद नहीं आती है। नींद आने के लिए हमारी उम्र में बड़े पैंतरे करने पड़ते हैं.....ये रात से आपके सम्बन्ध पर भी निर्भर करता है...बचपन में मेरे पिताजी मुझसे कहते थे सो जाओ पर हम सोते नही थे-फिर कहते थे....आँखे बन्द करो और एक सपना देखो-जैसे ही सपना खत्म हो जाए, मुझे तुरन्त सुना देना-मेरे अच्छे सपने की तलाश वहीं से शुरु हो जाती थी। जैसे ही सपना मिलता-एक आवाज़ आती...उठो बेटा घूमने चलते है...सुबह हो गई...और सुबह हो जाती थी...रोज़ सुबह घूमते समय मैं पिताजी को अपना टूटा-फूटा सपना सुनाता था- पर आलकल रात, पूरी रात चलती है....सपने हैं जो थकी हुई उबासी की तरह आते है और वहीं उस वक़्त खत्म हो जाते हैं....मेरे पिताजी को भी नींद नहीं आती थी...अब सोचता हूँ कि वो दिन भर एक कमरे में अकेले क्या करते होंगे....कमरा, जिसमें सुबह और रात का पता खिड़की से आती हुई रोशनी के आने और जाने से लगता था--एक बल्ब था नीरस-सा....जिसे जला दो तो समझो रात होने वाली है और बुझा दो तो समझो सुबह....पर वो मुस्कुरा देते थे-बल्ब जलाने का काम मेरा था। जब भी उनके कमरे में बल्ब जलाने जाता था तो पिताजी मुझे देखकर मुस्कुरा देते थे।
पीताम्बर : वह मुस्कुरा देते थे?
लाल : हाँ वह मुस्कुरा देते थे।
पीताम्बर : हाँ वो मुस्कुरा देते थे....बल्ब बुझाने का काम मेरा था। जब भी मैं दादाजी के कमरे में बल्ब बुझाने जाता था-तो वो हमेशा मुझे देखकर सचेत हो जाते थे....जैसे उस कमरे में और भी बहुत से लोग हैं.....जिनसे वो मेरे आने के ठीक पहले तक बातें कर रहे थे....मैं पूरे कमरे में देखता कि वो कौन लोग है जिन्हें दादाजी छुपाना चाहते हैं-अजीब-सी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर छा जाती थी, जैसे कि वो रँगें हाथों पकड़े गए हों....मैं डर के मारे बल्ब बुझाकर भाग जाता था...अरे तुम कहाँ चल दिए ?
लाल : चाय चढ़ाने।
पीताम्बर : इसका क्या होगा ?
लाल : पता नहीं।
पीताम्बर : ये कहानी पूरी नहीं करोगे ?
लाल : करुँगा।
पीताम्बर : कब ?
लाल : अभी....अभी चाय ब्रेक।
पीताम्बर : रुको।
लाल : क्या मैं एक चाय नही पी सकता।
पीताम्बर : चाय पीते वक़्त क्या सोचोगे ?
लाल : अरे ये मैं कैसे बता सकता हूँ।
पीताम्बर : तुम यहीं तय करते जाओ कि चाय पीते वक़्त क्या सोचोगे।
लाल : तय कर लिया।
पीताम्बर : क्या ?
लाल : तुम्हें क्यों बताऊँ (लाल भीतर चला जाता है)।
(अब अगले तीन सीन लाल भीतर चाय बनाते हुए सोच रहा है- जो बाहर हो रहे हैं। तीसरे सीन में लाल खुद बाप के साथ आ जाता है।)
(पीताम्बर पिताजी का एक लेटर लेकर बूढ़े आदमी की बाल्कनी में जाकर खड़ा हो जाता है।)
बूढ़ा आदमी : पीलिया पीला स्कूटर चलाने से खत्म हो जाता है। पर विश्वास करना पड़ता है। पीलिया के कारण मुझे पीले रंग से नफ़रत है।
पीताम्बर : कोई आदमी पीला स्कूटर कैसे चला सकता है। इस बात पर मुझे हँसी आती है। पर मेरे पिताजी के पास इसके कई कारण थे और वो अपने सारे बचकाने कारण मुझे लिखकर बताते थे जिसका नतीजा यह हुआ कि बाद में मैने उनका लिखा हुआ पढ़ना बन्द कर लिया।
बूढ़ा आदमी : छोटे सवालों के छोटे जवाब हो सकते हैं। पर कुछ सवाल इतने बड़े हैं कि उनके जवाब नहीं होते। वो आपके साथ रहने लगते हैं।
पीताम्बर : मैं जब भी पिताजी के लिखे कारण को पढ़ता तो उनसे एक ही बात कहा करता था कि वो मुझे मेरे सपनों जैसे लगते हैं .....टूटे-फूटे, अधूरे, बचकाने।
बूढ़ा आदमी : मैंने अपने अधिकतर लिखे खतों में अपने बेटे से अपने बचकाने सपनों का ही ज़िक्र किया है। पर अन्त हमेशा एक ही लाइन से किया है।
पीताम्बर : (खत का अन्त पढ़ते हुए)मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ कब आऊँ ?
बूढ़ा आदमी : जवाब कभी नही मिला क्योंकि वो मेरे खत खोलकर कभी पढ़ता ही नहीं था। इसलिए मैंने एक ख़त के ऊपर ही लिख दिया ‘‘730AM आ रहा हूँ’’
(ब्लैक आउट)
(पीताम्बर लाल की बाल्कनी में खड़ा है.. नील बाल्कनी में आती है और उसके सामने खड़ी होकर उससे पूछती है।)
नील : अन्दर आऊँ ? या नही आऊँ ?
पीताम्बर : तुम अन्दर आ चुकी हो।
नील : तुम बहुत थक गए हो, इतना मत सोचो ।
पीताम्बर : तुम्हारे सामने बेचारा बनने में कितना सुख मिलता है।
नील : बेचारी मैं।
पीताम्बर : तुम मुझे कभी माफ़ नही करोगी ना ?
नील : तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करुँ।
पीताम्बर : हाँ मैं चाहता हूँ... मैं चाहता हूँ कि तुम यहाँ कभी ना आओ।
नील : क्यों मुझमें एक फाँस ढूँढ़ रहे हो ?
पीताम्बर : नहीं।
नील : तुम जब भी मुझसे प्यार करते हो मुझे लगता है कि तुम मुझसे
बदला ले रहे हो।
पीताम्बर : किस बात का ?
नील : वो चीजें जो तुम्हारे पास नहीं हैं, उनका। या वो चीजें जो सिर्फ तुम्हारे ही पास है।
पीताम्बर : जो बाते मैं तुमसे कहता हूँ तुम्हारे जाने के बाद उनसे कही ज्यादा उन बातों की कतरनें मेरे घर में बिखरी रहती हैं जो मैं तुमसे नही कह पाता हूँ।
नील : क्या कहना चाहते हो ?
पीताम्बर : पता नहीं। (किचेन से कुछ गिरने की आवाज़ आती है) कहानी पूरी करनी है।
नील : क्या कहती है तुम्हारी कहानी। आज पूरी हो जाएगी ?
पीताम्बर : आज पूरी करनी है। वो पिताजी के सारे लेटर्स खोल के पढ़ चुका हूँ सिवाए अन्तिम लेटर के। अगर वो खुल गया तो कहानी यहीं रुक जाएगी।
(डोरबेल)
(लाल और उसके पिता दरवाजे़ से अन्दर आते हैं। लाल के कपड़े अलग है.. वह इस समय तीसरे सीन में हैं जो वह भीतर चाय बनाते हुए सोच रहा है।)
लाल : आइए, आइए पिताजी सँभल के हाँ, यहाँ बैठ जाइए।
पिता : कैसे हो बेटा? यहाँ सब ठीक है ना.....मुझे कई दिनों से बुरे सपने आ रहे थे- लगा तुम्हारा एक्सीडेन्ट हो गया है....तुम फिर से बीमार पड़ गए हो....तुम्हें जॉन्डिस हो गया है .....
लाल : नही....
पिता : मेरी तबीयत ठीक नहीं है ....फिर भी मैं आ गया....सोचा कुछ दिन तुम्हारे साथ रह लूँगा तो सब ठीक हो जाएगा....वैसे मैंने अपने सारे लेटर्स के अन्त में तुमसे पूछा है कि मैं तुम्हें मिलने आऊँ-पर तुमने जवाब नहीं दिया....मैं यहाँ ज्यादा दिन नही रुकूँगा, मुझे पता है तुम्हें मेरा यहाँ आना पसन्द नहीं......
पीताम्बर : नहीं ऐसी बात नहीं है....पापा...मैं...मैं...कुछ बोलो ना....
लाल : पानी पियेंगे ?
पिता : जो पूछना चाह रहे हो....पूछ लो....
लाल : आप बल्ब जलाने जाते थे ना...तो आपने इंदिरा गांधी के मरने की ख़बर दादाजी को क्यों नहीं दी.....?
पिता : इसमें तुम्हारी ग़लती नहीं है......
नील : उन्होंने कह दिया, इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं है...चुप रहो।
लाल : मेरी ग़लती की मुझे चिन्ता नहीं, पर आप......
नील : देखो ये मत पूछना......
लाल : आप माँ को छोड़कर क्यों चले गए थे...? बाद में माँ से बार-बार मिलने क्यों आते थे....?
नील : उनकी तबीयत ठीक नहीं है और तुम ......
पिता : पता है जब मैं और मेरे पिताजी रोज़ घूमने जाया करते थे ना तो मैं उन्हें अपने सपने के बारे में बताया करता था....हर रोज़...। उस वक़्त मेरे पिताजी के रंग की एक काली चील हमारे सिर के ऊपर मँडराया करती थी- पिताजी कहते थे-जब मैं ना रहूँ तो तुम अपने सपने इस चील को सुना देना और मान लेना कि मैं सुन रहा हूँ.....मैंने मान लिया-आज तक मैं यही मानता आ रहा हूँ, तुम्हें भी अन्त मानना पड़ेगा।
नील : देखो तुम मान सकते हो.....मान लो अन्त....और कहानी खत्म करो।
पिता : आजकल सपने नहीं आते....रात पूरी रात चलती है.....सोते रहना बड़ी कला है जो एक उम्र के बाद कम होती जाती है....सुबह घूमने भी नहीं जाता हूँ....क्योंकि चील बूढ़ी हो चुकी है.......वो ऊपर आसमान में नही उड़ती....उसके पर झड़ते हैं.....वो मेरे घर के सामने-एक पेड़ के ठूँठ पर बैठी रहती है..........मैं रोज सुबह घर से निकलकर उस पेड़ के नीचे जाके थोड़ी देर बैठ जाता हूँ-मेरे पास कोई सपना नहीं होता लेकिन चील सपना सुन रही होती है-वो मान लेती कि मैं सपना सुना रहा हूँ.......और मैं मान लेता हूँ कि वो सपना सुन रही है..
लाल : पर आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया.....?
नील : वो जवाब दे चुके हैं।
पिता : इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।
पीताम्बर : ये तो मैं अपने आपको कब से समझा रहा हूँ....पर उस डर का क्या करुँ....जिसे एक बुखार की तरह मैं अपने भीतर पाल रहा हूँ....जो बढ़ता नही है, घटता भी नहीं है, बस रहता है वहीं आपके भीतर।
लाल : ये डर है शब्दों का .....अनकहे शब्दों का....जो कोई आपसे कहना चाह रहा था पर आप उसे अनसुना करते रहे। हर सुबह जब मैं दादाजी के कमरे में बल्ब बुझाने जाता था...तो वो कुछ शब्द मुझसे कहते थे-शब्द जिन्हें मैं समझता तो था पर सुनना नहीं चाहता था। मैं डर के मारे उनके सामने चिल्ला देता था-क्या...क्या? पानी चाहिए...?.क्या....?चाय....चाय चाहिए? भूख लगी है...? अच्छा मैं बाद में आता हूँ और उनके कमरे से बाहर निकल आता था।
पीताम्बर : पर वो शब्द...वो अधूरे शब्द पूरे दिन मेरे कानों में गूँजते रहते थे। बाद-बाद में वो डर इतना बढ़ गया कि मैंने उनके कमरे में जाना ही बन्द कर दिया- चुपके से बल्ब बुझाने जाता था और वहाँ से भाग जाता था।
पिता : तुम पीला स्कूटर मत बेचना उसे अपने पास ही रखना।
लाल : आपने दादाजी को इंदिरा गांधी के मरने की खबर क्यों नही दी?
पिता : तुम अपने सपने....अपनी कहानियाँ स्कूटर को सुनाया करना और मान लेना मैं सुन रहा हूँ।
बूढ़ा आदमी : (निर्मल वर्मा ने कहीं लिखा है) ’एक उम्र के बाद माँ-बाप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र की छाया तले छोटे होते जाते हैं।’ मेरे पिताजी सचमुच बच्चे हो गए थे। वेा फिल्म देखने के पीछे पागल थे...वो बच्चों जैसी ज़िद करने लगते थे। खाना-पीना छोड़ देते थे। शनिवाद को फ़िल्म देखते थे, लेकिन मैनें उन्हें संडे को फिल्म नही देखने के लिए जैसे-तैसे मना लिया था....मुझे लगा मैं उनसे उनके जीवन को आधी साँसें माँग रहा हूँ। उन्हें बहुत दुःख पहुँचा था...मैं सावित्री से बहुत नाराज़ हुआ करीब एक हफ़्ते घर भी नहीं आया.....खैर....अन्त में वो नही मानी।
लाल : मुझे माफ़ कर देना पापा.....
पिता : नहीं-इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है...बेटा मुझे......अन्दर....
लाल : चलिए मैं ले चलता हूँ...कहाँ जाना है......
पिता : बाथरुम।
(लाल पिताजी को लेकर अन्दर आता है, ब्लैक आउट होता है। जब लाइट आती है तो पीताम्बर टाइप कर रहा होता है और हम देखते हैं, एक बाल्कनी में बूढ़ा आदमी और एक बाल्कनी में पिता नाच रहे होते है... ये उनके पात्रों के लिखे जाने का उत्सव जैसा है। लाल चाय का कप लेकर अन्दर आता है, बाप और बूढ़े आदमी पर से लाईट जाती है.. और कहानी आगे बढ़ती है।)
पीताम्बर : चाय ब्रेक ओवर ?
लाल : हाँ....चाय ब्रेक ओवर।
पीताम्बर : फिर क्या हुआ ?
लाल : फिर इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई।
पीताम्बर : फिर एक दिन खबर आई कि इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई है..... 31 अक्टूबर, बुधवार....पूरे देश में शोक मनया गया। टी0वी0 पर भी फिल्में दिखाई जानी बन्द हो गई....पिताजी ने माँ से कहा-इंन्दिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को दे देना और माँ ने.....
लाल : और माँ ने वो काम मुझे सौंप दिया.... बेटा अपने दादाजी को बता देना कि इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई है...इसलिए टी0वी0पर फिल्में नहीं आ रही हैं।
पीताम्बर : मैं कई दिनों तक दादाजी के कमरे के इर्द-गिर्द मँडराता रहा....उसमें एक सेटर्डे संडे भी निकल गया पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
लाल : फिर एक दिन मैं दादाजी के कमरे में गया...घुसते ही लगा जैसे वो मेरा इन्तजार कर रहे थे। मैं उनके पास गया तो उन्होनें मेरा हाथ पकड़ लिया.....कसकर पता नहीं इतनी ताकत उनमें कहाँ से आ गई थी। मुझे अपने पास खींचा और कहा ‘‘मेरे कान खराब हो गए हैं, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है’’ वो एक साँस में इतनी लम्बी लाइन कैसे बोल गए-वो हाँफने लगे, उन्हें मेरे भाग जाने का शायद डर था, इसलिए उनके हाथ की पकड़ तेज होती जा रही थी......उन्होने मुझे और पास खींच लिया...शायद वो और कुछ कहना चाह रहे थे-पर उनका चेहरा डरावना होता जा रहा था। मैं डर गया जल्दी में मैने कहना चाहा कि-‘‘इन्दिरा गांधी की मृत्यु हो गई है इसलिए टी0वी0 पर फिल्में नहीं.....’’ पर मेरे मुँह से एक शब्द भी नही निकला। मैंने देखा उनकी आँखें पीली होती जा रही हैं.... चेहरा काला-पीली आँखें......वो एकदम चील जैसे दिखने लगे थे-मैं डर गया...मैंने अपना हाथ छुड़ाया और कमरे से बाहर निकल आया।
बूढ़ा आदमी : इतवार को मुझे अभी भी याद है...जब मैं उनके कमरे में बल्ब जलाने गया था, तो देखा उनकी आँखें उनके माथे तक चढ़ी हुई हैं। वो टी0वी0 वाले कमरे की तरफ़ देखने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे अजीब लगा, क्योंकि वो पहली बार मुझे देखकर मुस्कुराए भी नहीं.....पास पहुँचा तो देखा उनका शरीर पूरी तरह अकड़ा हुआ है.....इच्छा तो हुई कि सावित्री को घसीटकर लाऊँ और ये दृश्य दिखाऊँ...पर मैं उनके पास जाकर बैठ गया ... उनसे माफ़ी माँगी.....उनकी पलकों पर हाथ फेरा और उनकी आँखें बन्द हो गई।
(बूढा आदमी उठकर जाने लगता है।)
लाल : कहाँ जा रहे हैं आप ?
बूढ़ा आदमी : बाथरुम।
पीताम्बर : लगातार पिताजी का बाथरुम आना मैं देखता रहा.....वो बहुत परेशान थे-मेरी इच्छा हुई पिताजी से कहूँ कि मेरे कारण ही दादाजी की मृत्यु हो गई...मैं ही उन्हें इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बारे में नही बता पाया....पर...मेरी हिम्मत ही नहीं हुई...मुझे मार खाने का डर नहीं था। मुझे पिताजी की चिन्ता थी, वो दादाजी की मौत के कारण पूरी टूट चुके थे-मैंने सोचा समय आने पर बता दूँगा। सही समय आने पर बता दूंगा......
लाल : मैं सही वक़्त का इन्तजार ही करता रहा....दादाजी की मृत्यु के तीसरे दिन पिताजी घर छोड़कर चले गए थे....वो जाते वक़्त अपना सारा सामान भी ले गये थे। सारा समान, मतलब एक झोला और एक पेटी। पीला स्कूटर छोड़ गए थे.... उस वक़्त भी उन्हें मेरे जॉन्डिस की चिन्ता थी।
पीताम्बर : पिताजी के आए सभी लेटर्स को मैने कभी खोला नही, पर पिछले दो महीने से उन्हें खोलता हूँ, पढ़ता हूँ, जवाब लिखता हूँ। उनका अन्तिम लेटर दो महीने पहले आया था...ये मैंने अभी तक नहीं खोला है....कल 7:30AM आ रहा हूँ....ऊपर ही लिखा है....। इस लेटर के बाद ना वो आए, न उनका कोई लेटर,.... किसी के मरने का आपको उतना दुःख नहीं होता है, जितना इस बात का कि उसके साथ-साथ वो सम्बन्ध भी जल गया, जो सिर्फ आप दोनों जी रहे थे....एक साथ.....। फिर लगने लगता है जैसे आपके साथ धोखा हुआ है.. आप दोनों का एक संबंध का एक पुल था जिसपर आप दोनों चला करते थे.. एकसाथ। अचानक वो अपना हिस्सा काट कर चला गया....अब आप अधूरे पुल के छोर पर खड़े हैं....जहाँ से आपको उसके जीवन का किनारा तो दिख रहा है पर उस किनारे के रहस्यों को आप कभी नहीं जान पाएँगे......वो दिन-ब-दिन आपसे दूर होता जाएगा......
लाल : कहानी तो दादाजी की मौत पर खत्म हो चुकी है.....अब ये जो भी हैं उस कहानी की कतरनें है-जो इस कहानी में ही हैं.... पर इनकी कहानी को अब कोई ज़रुरत नहीं है।
पीताम्बर : 7:30AM पिताजी आने वाले हैं।
लाल : हाँ।
पीताम्बर : एक बात पूँछू ?
लाल : पूछो !
पीताम्बर : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ? हा-हा-हा.....
(चला जाता है ....पिता का प्रवेश)
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : मान लेने के लिए मेरे पास ज़्यादा कुछ नहीं है....एक पीला स्कूटर है, जिसे पिताजी के खतों के जवाब पढ़कर सुनाता हूँ और मान लेता हूँ कि पिताजी सुन रहे हैं, इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : अब मुझे पीलिया का भी डर है इसलिए मैं पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : मैं असल में... अपने आपसे बदला ले रहा हूँ...ये पीला स्कूटर नहीं है ये असल में मेरी उँगली में फसी हुई एक फाँस है...जिसे मैं आपने साथ लिये घूमता हूँ। इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : अपराध बोध अगर पीठ पर लादे घूमते रहोगे तो जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा।
लाल : आप....आप कब आए ?
पिता : 7:30AM मैंने कहा था आऊँगा।
लाल : कब तक आप आते रहेंगे ?
पिता : जब तक तुम मेरा अन्तिम लेटर खोलकर पढ़ोगे नही.....
लाल : मेरे पास बहुत सारे सवाल थे-जिनका उत्तर सिर्फ़ आप जानते थे। इन सवालों के साथ, आपसे मिलने से भी मै डरता था- इसलिए मैं पूछ नहीं पाया ...पर कोई है जो इन सवालों के उत्तर जानता है...ये विश्वास ही अपने आपमें इतना बड़ा था कि इन प्रश्नों के साथ् मैं आराम से जी रहा था। पर आपकी मृत्यु के साथ ही ये विश्वास भी मर गया और ये कल्पना ही अपने आप में इतनी डरावनी लगने लगी कि अब पूरी जिन्दगी आपको अकेले ही इन प्रश्नों के बोझ तले जीना पड़ेगा। अब कोई भी नहीं है जो इन प्रश्नों के उत्तर जानता है...पर अब मैंने मान लिया है कि आपने मेरे सारे सवालों के उत्तर अपने इस अन्तिम ख़त में लिख दिए हैं। इस ख़त को मैं पूरी ज़िन्दगी अपने पास रखूँगा पर खोलूँगा नही....मैंने मान लिया है।
पिता : मैंने कहा था अन्त तुम्हें मानना पड़ेगा...अच्छा है तुमने मान लिया। अब मैं नही आऊँगा। मैं जाता हूँ।
लाल : पापा... मेरी एक इच्छा है, मै एक बार आपकी गोद में सर रखकर सोना चाहता हूँ, सो सकता हूँ ? और जब तक मैं सो ना जाऊँ आप कुछ बोलते रहना ....
पिता : क्या बोलता रहूँ ?
लाल : वही जो मैं सुनना चाहता हूँ।
पिता : सो जाओ.... सभी अपने-अपने तरीके़ से रात के साथ सोते हैं। हर आदमी का रात के अँधरे के साथ अपना सम्बन्ध होता है। ये सम्बन्ध अगर अच्छा है तो आपको नींद आ जाती है और अगर सम्बन्ध ख़राब है जो आपके जीवन के छोटे-छोटे अँधेरे, रात के अँधेरे में घुस आते है जो आपको सोने नही देते और आप दूसरों को....



अंत.................................................................

बुधवार, 23 मार्च 2011

ऐसा कहते है...


ऐसा
कहते
है...








सीन-1

सैम- मुझसे शादी करोगी?
काया- नहीं।

सीन-2

काया- तुमने इतने सालों में कोई दूसरा तरीका नहीं सीखा।
सैम- तुमने इतने सालों में दूसरे तरीकों से जवाब देना नहीं सीखा।
काया- हाँ, तुमने कभी गिना हैं कितनी बार तुम मुझे शादी के लिए प्रपोज कर चुके हो?
सैम- मैं अपने फ़ेल्योर्स (failures) याद नहीं रखता।
काया- हमने कितना अच्छा समय साथ में गुजारा हैं अभी भी कहानियां कहते ही हो कि उन्हें लिखना भी शुरू किया हैं।
सैम- सुनने वाले कम हैं पर कहता ही हूँ मेरी कहानियां सुनना हैं तो मेरे पास आना पड़ेगा और वो मेरे साथ ही खत्म हो जायेंगी
काया- कुछ सुनाओं
सैम- क्या
काया- कुछ भी
सैम- एक छोटी कहानी

बहुत पहले अब तो मुझे याद भी नहीं कब
मैंने अपने हाथ पर लिख दिया था ’प्रेम’
क्यों? क्यों का पता नहीं पर शायद ये
भीतर पड़े सूखे कुंए के लिए बाल्टी खरीदने की आशा जैसा था।
से मैंने इसे अपने हाथ पर लिख लिया- ’प्रेम’
आशा? आशा ये कि इसे किसी को दे दूँगा।
जबरदस्ती नहीं चोरी से भी नहीं
किसी की जेब में डाल दूंगा या किसी की किताब में रख दूंगा
या ’रख के भूल गया जैसा’ किसी के पास छोड़ दूंगा
इससे क्या होगा ठीक-ठीक पता नहीं
पर शायद मेरा ये ’प्रेम’ उस किसी के साथ रहते-रहते जब बड़ा होगा, तब
तब मैं बाल्टी खरीदकर अपने सूखे कुंए के पास जाउंगा
और वहाँ मुझे पानी पड़ा मिलेगा
पर ऐसा हुआ नहीं- ’प्रेम’ चोरी से मैं किसी को दे नहीं पाया
वो मेरे हाथ में ही गुदा रहा





फिर इसके काफी समय बाद अब मुझे याद नहीं कब
मुझे तुम मिली और मैंने.....
अपने हाथ में लिखे इस शब्द ’प्रेम’ को वाक्य में बदल दिया.....
’मैं तुमसे प्रेम करता हूँ’
और इसे लिये तुम्हारे साथ घूमता रहा.....
सोचा इसे तुम्हें दे दूंगा.....
जबरदस्ती नहीं.... चोरी से.....

तुम्हारे बालों में फंसा दूंगा.....
या तुम्हारी गर्दन से लुढ़कती हुई पसीने की बूंद के साथ बहा दूंगा।
या अपने किसी किस्से कहानियां कहते हुए..... इसे बीच में डाल दूंगा।
फिर जब ये वाक्य तुम्हारे साथ रहते-रहते बड़ा हो जायेगा।
तब मैं अपने कुंए के पानी में..... बाल्टी समेत छलांग लगा जाउंगा।
पर ऐसा हुआ नहीं..... ये वाक्य मैं तुम्हें नहीं दे पाया.....
पर अभी कुछ समय पहले..... अभी ठीक-ठीक याद नहीं कब.....
ये वाक्य अचानक कहानी बन गया।
’प्रेम’..... मैं तुमसे प्रेम करता हूँ- और उसकी कहानी।
भीतर कुंआ वैसा ही सूखा पड़ा था.....
बाल्टी खरीदने की आशा...... अभी तक आशा ही थी!
और ये कहानी.....
इसे मैं कई दिनों से अपने साथ लिये घूम रहा हूँ।
अब सोचता हूँ..... कम से कम..... इसे ही तम्हें सुना दूंगा.....
जबरदस्ती नहीं..... चोरी से भी नहीं..... बस तुम्हारी इच्छा से.....


काया- ये तो कविता जैसी हैं.....
सैम- मेरे लिए ये कहानी है।
काया- मिलने के लिए तुम्हें ये ही जगह..... रेलवे स्टेशन
सैम- क्या करू दिन भर तुम्हारे पास समय नहीं था और शाम की ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिला।
काया- नहीं मिला या नहीं लिया।
सैम- जो भी हैं..... तुमसे मिलना जरूरी था।
काया- कितनी चुप्पी हैं यहाँ।
सैम- अरे तुम्हें ये कबूतरों की आवाज सुनाई नहीं दे रही।
काया- वो दिख भी रहें हैं। पर ये इस चुप्पी को और भी बढा रहें हैं।
सैम- चार पच्चीस की ट्रेन हैं..... शायद इससे कम ही लोग जाते है।
काया- ये कोना तो रेलवे स्टेशन का हिस्सा भी नहीं लगता है।
सैम- भई S-1 तो यहीं आयेगा।



काया- हम इतने सालों बाद रेलवे स्टेशन पर बात करते पाये जायेंगे, तुम्हें अजीब नहीं लग रहा ?
सैम- पता नहीं.... असल में मैंने तुम्हें लगभग हर जगह प्रपोज किया हैं पर रेलवे स्टेशन पर कभी नहीं इसलिये........
काया- जगह बदलने से कुछ नहीं होगा।
सैम- मैं भी काफी बदल गया हूँ।
काया- बस तुम्हारी कहानियां छोटी हो गई हैं।
सैम- बस..... मेरे कहने का तरीका भी बदला हैं.....
काया- क्या कहने का.....
सैम- पहले या तो मैं खड़े होकर या बैठ कर कहता था अब ये देखो नया तरीका, मैं अपने घुटनों पर बैठ कर कहता हूँ..... मुझसे शादी करोगी.....?
काया- नहीं......


सीन-3

सैम- तुम्हें ना कहने में बहुत सुख मिलता हैं ना.....
काया- मना करने का अपना तो सुख हैं..... पर .....
सैम- पर..... ?
काया- देखो हम एक दूसरे को स्कूल से जानते हैं मुझे पहले अजीब लगता था जब तुम मुझे प्रपोज करते थे.... पर अब तो ये मुझे अपनी बातचीत का ही हिस्सा लगता हैं प्रेडिक्टबल सी बात है और मैं इसके लिए हमेशा तैयार भी रहती हूँ.......
सैम- प्रेडिक्टबल.....
काया- सॉरी...... नहीं प्रेडिक्टबल सही शब्द नहीं है।
सैम- नहीं सही हैं, मैं यूं भी काफी प्रेडिक्टबल हूँ.......
काया- देखो मैं..... अब मैं तुमसे कैसे कहूँ...... मेरी इच्छा है.... नहीं इच्छा नहीं....मेरी कल्पना है.... फ़ैंटेसी है...... कि जब कोई मुझे प्रपोज करे तो वो ऐसा हो कि उसके प्रपोज करते ही चारों तरफ मुझे संगीत सुनाई दे..... फूल झड़ने लगे और सब कुछ..... सब कुछ बदल जाए एकदम..... और मैं चाहूँ मेरे मुँह से हाँ ही निकले।
सैम- तुम्हें पता हैं संगीत के मामले में मैं कौवा हूँ।
काया- शायद तभी तुम्हारे प्रपोज करने पर कभी संगीत सुनाई नहीं दिया।
सैम- कम से कम तुम कोशिश तो कर ही सकती हो।
काया- क्या...... मैं क्या कोशिश कर सकती हूँ ?
सैम- तुम महसूस कर सकती हो कि...... संगीत सुनाई दे रहा है।
काया- हे भगवान, तुम नहीं समझोगे.....
सैम- अच्छा एक मौका तो दो मुझे..... प्लीज... एक बार मेरे लिए एक कोशिश तो करो...
काया- मैंने तुमसे सब कहा ही क्यों ?
सैम- देखो तुम आँखे बंद करो.... कोशिश करो सब होगा...
काया- ये भी कर लो...
सैम- मुझसे शादी करोगी ?
काया- नहीं।

सीन-4

काया- कैसा लग रहा हैं... मेरा गाँव तुम्हें....?
सैम- कैसा लगेगा...
काया- मुझे विश्वास नहीं होता तुमने मेरे पीछे अपना ट्रांसफ़र करवा लिया।
सैम- तुम्हारे लिये नहीं अपने लिये...
काया- अपने लिये....?
सैम- मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ.... प्योर सेलफ़िश रीजन....
काया- खैर... इतने समय तुम कहाँ थे ?
सैम- क्यों, तुम मेरा इंतजार कर रहीं थी ?
काया- नहीं, इतने समय बाद दिखे इसलिए पूछा इतने समय कहाँ थे।
सैम- वहीं मेरा इलाज चल रहा था, फिर उसी बीच जॉब भी लग गया और पिछले कुछ महीनों से तो सिर्फ सरकारी लोंगों को घूस खिला रहा था कि मेरा तबादला यहाँ करा दो वैसे तुम इस गाँव में क्या कर रही हो ?
काया- NGOs के लिये काम।
सैम- जब मैं अपना तबादला करता रहा था तो लोग कह रहे थे कि लोग वहाँ से शहर तबादला करवाने के लिये पैसे देते हैं और आप वहाँ जाने के लिये पैसे दे रहे हो। सब हँस रहे थे मेरे ऊपर।
काया- तुम्हें इतना विश्वास कैसे है कि मैं हाँ कर ही दूंगी ?
सैम- पता नहीं... बस है... और इसका एक घटिया कारण भी हैं मेरे पास... देखो हम सालों पढ़ाई करते हैं कि अच्छा जॉब लग जाये और उस जॉब के साथ हम अपनी पूरी जिंदगी काट सके। जॉब तो मिल गया पर पूरी जिंदगी मैं जॉब के साथ नहीं काटना चाहता हूँ, ये समझ लो कि मैं फिर पढ़ रहा हूँ, मेहनत कर रहा हूँ.... कि पास हो जाऊँ, तुम हाँ कह दो और पूरी जिंदगी मैं तुम्हारे साथ काट सकूं। क्या हुआ.... अरे अच्छा नहीं लगा...?
काया- बचकाना है।
सैम- इसलिये तो मुझे भी अच्छा लगा।
काया- मैंने तुम्हें इतनी बार कहा हैं कि तुम मेरे दोस्त हो..... एक अच्छे दोस्त.... बस... और तुम जानते ही हो कि मैं engaged हूँ।
सैम- थीं तुम engaged थीं।
काया- ओह तो तुम्हें पता है।
सैम- जैसे ही तुम्हारा उससे रिश्ता शुरू हुआ क्या नाम था उसका?
काया- ईश्वर।
सैम- हाँ, जो भी हो मैंने उससे दोस्ती जैसी कर ली थी उसे फोन करता था इधर-उधर की बातें करता था, तुम्हारा हालचाल पूछता था और बस इंतजार करता था।
काया- कहीं तुमने उससे मेरे बारे में कुछ? कहीं तुम्हारी वजह से?
सैम- नहीं-नहीं... मैंने कहा ना मैं अपनी पढ़ाई कर रहा हूँ मैं अपनी मेहनत से पास होना चाहता हूँ दूसरों से कोई मतलब नहीं।
काया- तुम सच में थोड़ा बदल गये हो।
सैम- मैंने कहा था ना।
काया- इतनी देर से तुमने एक चाय भी नहीं पी।
सैम- इच्छा तो बहुत हो रही हैं, पर आज ही के दिन दुकान बंद रहती हैं।
काया- बैड लक
सैम- क्या तुम्हें मुझमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता ?
काया- लगता हैं ना जब तुम कहानियाँ सुनाते हो। मुझे तुम्हारे मुँह से कहानियाँ सुनना अच्छा लगता है।
सैम- ठीक हैं मैं तुम्हें जिंदगी भर कहानियाँ सुनाऊँगा ये वादा करता हूँ क्या अब तुम मुझसे शा।
काया- नहीं

सीन-5

काया- कुछ सुनाओ ना?
सैम- क्या...? क्या सुनोगी ?
काया- कुछ भी
सैम- अच्छा ये कहानी सुनो एक बार सर्कस के दो लड़के छोटू और बंटी चोरी के इल्जाम में पकड़े जाते हैं और (काया ताली तजाती हैं, सैम कहानी कहना बंद कर देता है।)
काया- नहीं मुझे प्रेम कहानी सुनाओ।
सैम- प्रेम कहानी... ???
काया- हाँ तुम प्रेम कहानी अच्छी सुनाते हो।
सैम- अच्छा
काया- पर कहानी सुखांत होनी चाहिये।
सैम- क्या ? एक तो प्रेम कहानी ऊपर से सुखांत
काया- हाँ कहानी का अंत बस सुखद होना चाहिए इतना ही तो कह रही हूँ।
सैम- कोशिश करता हूँ... अ अ अ अ क्या मैं इस प्रेम कहानी में तुम्हारा जिक्र कर सकता हूँ।
काया- तब तो उसका दुखांत होना निश्चित है।
सैम- नहीं पर मैं कोशिश... जाने दो।
काया- हुआ... सुनाओ कहानी।
सैम- मैं सोच रहा था, किसी कहानी में से प्रेम निकाल दो तब भी क्या प्रेम कहानी हो सकती है?
काया- तब वो सिर्फ कहानी होगी।
सैम- सिर्फ कहानी... सिर्फ कहानी मतलब सिर्फ कहानी।
काया- मैं तुमसे सिर्फ प्रेम कहानी सुनना चाहती हूँ।
सैम- हाँ, वो मैं समझा क्या मैं इस प्रेम कहानी में किसी और नाम से तुम्हारा जिक्र कर सकता हूँ।
काया- देखो मैं बात अंत की कर रहीं हूँ कहानी सुखांत होनी चाहिये बस।
सैम- मुझसे शादी करोगी?
काया- देखो...
सैम- नहीं-नहीं ये कहानी है।
काया- अच्छा तुमने अंत से शुरूआत की हैं।
सैम- नहीं, ये शुरूआत ही है। देखो तुमने कहा था कि अंत सुखद होना चाहिए तो शुरूआत मैं कैसे भी कर सकता हूँ।
काया- देखो फंस जाओगे।
सैम- देखेंगे।
काया- अच्छा फिर फिर क्या हुआ ?
सैम- मुझसे शादी करोगी (पॉज) और लड़की ने मना कर दिया।
(सैम उठकर स्टेज की तरफ आता हैं स्टेज पर पैर रखते ही उसे ट्रेन के सायरन की आवाज आती हैं वो डर जाता है।)
काया- क्या हुआ डर गए ?
सैम- बहुत दिनों बाद कहानी सुना रहा हूँ। दिमाग में काफी पागलपन भरा हुआ है।
काया- जाने दो तुमसे नहीं होगा।
सैम- हं अच्छा? तो लो।


सीन-6

(कौआ गाने की कोशिश करता है)


कितनी सारी चांद की रातें, कितना दिन का उजाला
बाकी सब क्यों बने कबूतर, मैं क्यों बना कौवा काला
जिंदगी थोड़ी सी हो जाती बेहतर, जो मैं भी होता कबूतर।
कबूतर-कबूतर

(सब लोग उसे मारकर भगा देते हैं।)

गाना-
कबूतर-कबूतर
कबूतरों की कहानियाँ
तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा
चुनके-बुनके निशानियाँ
कबूतरों की कहानियाँ
कबूतर-कबूतर
जो कह ना सके हम डर गये।
या कहने से पहले ही मर गये
मरे हुए लोंगो की जिंदा परेशानियाँ।
कबूतरों की कहानियाँ
कबूतर-कबूतर
जो बात अधूरी लेके मरेगा
वो बनके कबूतर फिरेगा।
इस शहर का हर इक परिंदा
आधी कहानी लेकर हैं जिंदा
कबूतर-कबूतर
पर आज तलक तो हुआ नहीं
किसी आधी कहानी को छुआ नहीं
अब बात फंसी हैं कुछ ऐसी
होंगे आँसु या होगी खुशी।

भाई- तुझसे मना किया ना, बीच में आकर मत गाया कर कौवे।
कौआ- मैं गाना चाहता हूँ।
भाई- चाह लेने से गाना नहीं होता हैं, रियाज करना होता हैं, मेहनत करनी होती हैं कौवे।
कौवा- कौवा मत बोल मुझे।
भाई- चल दूर जाके बैठ और बीच में गाया तो पड़ेगा एक कौवे।

(वो अलग बैठ जाता हैं)


माँ- आज कितना मजा आया ना इंसान-इंसान खेलके। हैं ना...? क्या हुआ तुझे ? वहाँ क्यों बैठा हैं? अरे सुन ठंड लग जायेगी।
कौआ- हं
माँ- तो ऐसा उकडू बैठने से अच्छा है, एक चादर ले ले।
कौआ- ना
माँ- अरे मर जायेगा। चल सब लोग अंदर रियाज कर रहें हैं, हम फिर इंसान-इंसान खेलेंगे।
कौआ- मुझे नहीं खेलना
माँ- बापू कहाँ हैं तेरे ? अच्छा ठीक है जा थोड़ा उड़ ले गर्मी आ जायेगी।
कौआ- माँ मैं कौआ क्यों हूँ ? जब आप सब कबूतर हो तो मैं कौआ क्यों पैदा हुआ?
माँ- फिर किसी ने तुझे कौआ कहा? किसने कहा किसने कहा ? तू बस काला है
तो क्या हुआ बोल तू क्या हुआ ?
कौआ- काला कबूतर।
माँ- सही जवाब। कहाँ मर गया तेरा बापू? चल रियाज करने चलते हैं। ऐसी आदत पड़ गई हैं इंसान-इंसान खेलने की कि उसके बिना मेरा खाना ही नहीं पचतां।
कौआ- माँ हम ये इंसान-इंसान क्यों खेलते हैं ?
माँ- बेटा, हम पहले इंसा ही थे ये हमें भूलना नहीं चाहिये वर्ना हर बार हम कबूतर बनके ही पैदा होते ऐसी बापू की खोज है, अविष्कार है तेरा बापू बड़ा साइंटिस्ट है।
कौआ- आपने तो बताया था कि हम लोग गवैये थे। ट्रेनों में गा-गाकर पैसा मांगते थे फिर बापू सांईटिस्ट कैसे हो गये।
माँ- देख ऐसा कहते हैं कि ट्रेन का यहीं एक्सीडेंट हुआ था, हम सब यहीं मरे और तेरे बापू सांईटिस्ट हो गये। हजार बार बोल चुकी हूँ दोबारा मत पूछना।
(बापू तेजी से दौड़ते हुए आते हैं और दोनों के बीच में आकर खड़े हो जाते हैं।)
बापू- डिश डिश डिश।

माँ- क्या हुआ ?
बापू- मैं प्रकट हुआ ना डिश।
माँ- अभी यहीं से तो चल कर आ रहे हो।
बापू- छी छी छी छी मेरा ये अविष्कार भी असफल रहा।
कौआ- बापू आपने मेरा कुछ किया मैं कौन हूँ।
बापू- बेटा तू कौआ नहीं हैं बस ये समझ ले। अगर तू कौआ होता तो काँव-काँव नहीं कर रहा होता पर तू तो गाता हैं गाता है ना ये।
बस बेमर से- हाँ हाँ
कौआ- बापू, पर मेरी कभी-कभी काँव-काँव कहने की इच्छा होती है।
बापू- दबा दे उस इच्छा को। रोक ले कुचल दे वहीं पे। अब सुनो जो मैंने आज खोज की हैं। जो भी आदमी बीच में मर जाता हैं अपनी पूरी कहानी नहीं कह पाता वो कबूतर हो जाता हैं।
माँ- ये तो पुराना हुआ
बापू- अरे आगे तो सुन मेरे सपने में एक बार फिर विचित्र किंतु सत्य जैसा एक कबूतर आया उसने कहा कहानी कहो। बस। अगर तुम्हारी आधी कहानी, उस कही हुई कहानी से पूरी हो जायेगी तो तुम आजाद हो गये समझो। आजाद आजादी।
भाई- उसे कैसे पता ये ?
बापू- मैंने भी उससे पूछा तो वो कहने लगा उसे ठीक-ठीक पता नहीं हैं पर हाँ ऐसा कहते हैं।
सीन-7

बंटी- चाय पीयेगा छोटू ? छोटू सो गया क्या?
छोटू- नहीं, अभी सोने का बहाना कर रहा हूँ थोड़ी देर तक बहाना करूँगा फिर सच में नींद आ जायेगी।
बंटी- मैंने क्या समझाया था जब तक हम भाग नहीं जाते, हम दिन में सोयेंगे और रात में जागेंगे। ऐसा ही होता है।
छोटू- बंटी नया प्लान आया है? सुनाओ ना, बहुत दिनों से कोई नया प्लान नहीं सुना।
बंटी- ये कहानी है क्या जो बहुत दिनांक से नहीं सुनी। देख हमारे पास बस आज की ही रात हैं फिर ये हमें डाल देगे, जेल में। वहाँ से हमारे पुरखे भी भाग नहीं सकते।
छोटू- हमारे पुरखे भी जेलों में हैं?
बंटी- छोटू।
छोटू- माफ करना प्लान सुनाओ ना।
बंटी- प्लान गया तेल लगाने, बस भागना है।
छोटू- ठीक हैं। एक बार अभ्यास कर लेते हैं भागने का।
बंटी- नहीं अभी मैं कुछ सोच रहा हूँ।
छोटू- सोच लो अगर मैं भागते समय डर गया और सब कुछ भूल गया तो ? एक बार बस एक बार मजा आएगा।
बंटी- ठीक हैं, तैयार भाग। (दोनो अलग-अलग भागते हैं) लेफ्ट कौन सा है?
छोटू- ये।
बंटी- तो भाग बोलने पर किधर भागेगा?
छोटू- माफ कर दो। एक बार, एक बार और।
बंटी- चल आखिरी बार। भाग भाग (दोनों आपस में टकरा जाते हैं) क्या कहा था जब दो बार भाग बोलूं तो राइट भागना हैं। अगर लेफ्ट ये है तो राइट कौन सा है?
छोटू- अगर लेफ्ट ये है तो राइट कौन सा है?
बंटी- हाँ, कौन सा है ये? हैं मर्ख?
छोटू- अरे हाँ, पर मुझे कैसे पता लगेगा कि तुम दो बार भाग बोलने वाले हो?
बंटी- फिर बहस की, चलो अब अकेले अभ्यास कर मुझे सोने दो।
छोटू- भाग-भाग, धोखे में मत रहना कौवे जाग।
कौवा- भाग-भाग-भाग
भाई- चुप बेसुरे, मरेगा मेरे हाथ से।


सीन-8

सलीम- मरना चाहते हैं, मैं मदद कर सकता हूँ। मेरा काम है ये धंधा हैं मेरा। बस इसके बदले में जाने दीजिए मैं क्या चाहता हूँ उससे आपको क्या मतलब लेकिन सच बताऊँ, मुझे वो लोग बहुत पसंद हैं जिन्हें पता लग जाता हैं कि अब इसके बाद वो इस दुनिया में जी नहीं रहे हैं, बस जिंदा हैं।
आशीष- क्या तुम्हें कैसे? मैं असल में
सलीम- जाने दो मैं समझता हूँ देखिये मेरा तो ये काम हैं लोगों के मरने में उनकी सहायता करना। किसी ने कहा हैं- @ Life, like all other games, becomes fun when one realizes that’s just a game गेम, खेल और खेल में आपको पूरी आजादी होनी चाहिये कि आप कभी भी खेलना बंद कर सके तभी खेलने का मजा है।
आशीष- हाँ तभी खेलने का मजा हैं
सलीम- लेकिन तारीफ करूँगा आपकी मतलब आप जैसे लोंगो की जो लोग यूँ ही घिसटते नहीं पाये जाते हैं आप लोग मस्त जीते हें और मस्ती से चले जाते हैं।
आशीष- मस्ती... तुमने कभी मरने के बारे में सोचा है? आत्महत्या? तुम्हारे पास किताबी ज्ञान है जैसे प्रेम के बारे में सारा पढ़ लिया, सीख लिया पर प्रेम कभी नहीं किया।
सलीम- देखों मैं अभी खेल में हूँ और अभी और खेलना चाहता हूँ।
आशीष- तुमने अच्छा खेल चुना हैं। पिछले चार दिन से मैं यहाँ रोज आ रहा हूँ।
सलीम- जानता हूँ पहले दिन ही आपकी चाल देखकर समझ गया कि आप यहाँ क्यों आ रहे हो।
आशीष- तो तुम पहले दिन ही
सलीम- नहीं पहले दिन आप बहुत परेशान थे अगर उस उक्त मैं आपके पास आता तो आप डाँट कर भगा देते और बाकी दो दिन आप लोंगो की आँखों से बच रहे थे पर आज... आज आप कुछ ठान कर आये हैं।
आशीष- मेरे पास दो कहानियाँ हैं, ये दूसरी कहानी मैंने कल ही पूरी की हैं, और इसके पूरी होते ही मुझे लगा कि मुझे मर जाना चाहिये।
सलीम- एक बात कहूँ सौ से ज्यादा लोंगो की मदद कर चुका हूँ अब तक मरने में, लेकिन जितनी गंभीर बात आपने कही बहुत कम ही लोग कह पाते हैं अक्सर जो बेमौसम मरने आते हैं।
आशीष- अब इसका मौसम भी होता है ?
सलीम- जब मौसम होता है तो मैं बहुत व्यस्त होता हूँ। खासकर जब स्कूल का रिजल्ट निकलता है शादियों के मौसम में प्रेमी आते हैं हारे हुए लोगों का भी एक मौसम होता हैं। धोखा खाये लोगों का भी अपना मौसम होता हैं। और मौसम के साथ-साथ आत्महत्या की एक उम्र भी होती है। बूढ़े लोग बहुत आत्महत्या करते हैं क्योकि एक उम्र के बाद खेल में मजा आए या ना आए खेल में बने रहने की आदत पड़ जाती हैं।
आशीष- आदत

गाना-
आदत हैं हमको
जैसे हैं वैसे ही होने की, आदत हैं हमको
चादर से बाहर रखकर पाँव
सोने की आदत हैं हमको
सूरज गर ना निकले दिन में भी अँधेरा हो
अंधेरे में जी लेने की
चाय में घोल के गम पीने की, आदत हैं हमको
अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं, जो सब कह दे वही सही
गलत को सही सुन लेने की, आदत हैं हमको
पाँव का जूता काटे तो आँख में आँसु ना आयें
दिल चाहे छलनी-छलनी हो होंठ हमेशा मुस्काए
आँसु को रूमाल में रखकर, फिर रूमाल को खो देने की
आदत हैं हमको


सीन-9

(गाना खत्म होता हैं सब लोग अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं।)

कौआ- माँ! बापू कब आयेगें?
माँ- पता नही अब तो साल होने को आया।
कौआ- इस बार बापू ने वादा किया था कि मेरे लिए कुछ लायेंगे।
माँ- मैंने भी उनसे कहा था कि आते वक्त कुछ खाने के लिये लाना लेकिन वो नाराज हो गए कहने लगे कि मैं इस बार बड़ी खोज के लिये जा रहा हूँ। चल आ जा अब रियाज कर लेते हैं।
कौआ- मुझे नहीं करना रियाज वियाज। हे विचित्र किंतु सत्य जैसे जो भी हैं आप बस मेरे लिये मैं माँ , माँ वो देख अपनी तरफ कुछ आ रहा हैं।
माँ- कहाँ ? अरे किसी ने रॉकेट छोड़ा होगा नहीं-नहीं पतंग हैं नहीं जहाज अरे नहीं बेटा ये तो तेरे बापू हैं।
कौआ- बापू!! (धड़ाम से बापू बैक स्टेज से गिरते हुए प्रवेश करते हैं) बापू लगी तो नहीं ?
बापू- नहीं। हाँ हाँ हाँ मैं दुनिया घूम आया। मेरी खोज पूरी हुई मुझे पता लग गया दुनिया के मूल में क्या है, संपूर्ण सत्य क्या है।
भाई- क्या है बापू ?
बपू- मूल में कुछ भी नहीं हैं सत्य कुछ भी नहीं हैं।
कौआ- बापू मैं कौआ क्यों हूँ ये पता चला ?
बापू- तू कौआ नहीं हैं ये पता चला, पर तू क्या है ये पता नहीं चला।
माँ- कुछ खाने को लाये ?
भाई- माँ चुप करो। और क्या खोजा बापू ?
बापू- खोजा कि दुनिया बहुत बड़ी है बेटा उड़ते-उड़ते वाट लग गई।
भाई- और-और
बापू- और हाँ इंसानों की प्रजाति लुप्त होती जा रही है।
माँ- अरे जैसे हम लोग इंसान-इंसान खेलते हैं वैसे ही इंसान भी जानवर-जानवर खेलते हैं हम इसलिये खेलते हैं कि हम भूल ना जायें कि हम इंसान थे वो इसलिये खेलते हैं कि शायद उन्हें पता हैं कि असल में हम सभी जानवर हैं। जो भी हैं पर जो इंसान हैं वो लुप्तप्राय प्रजाति हैं।
कौआ- बापू पर मेरा क्या होगा ?
बापू- ऐसे बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। खुद के मरने से ही स्वर्ग मिलता हैं। तू कौन है ये तुझे खुद ही पता करना पड़ेगा। मैं चला।
माँ- अरे, अब कहाँ जा रहे हो ?
बापू- खोज में
माँ- काहे की।
बापू- खाने की। भूख लगी है।


सीन-10

छोटू- भूख लगी है।
बंटी- साला हमें बाँधकर कहाँ चला गया ? चाय चाय
चाय- क्या है?
बंटी- दो चाय देना।
चाय- पैसे कौन देगा।
बंटी- वो साहब देंगे।
चाय- वो बोलेंगे तभी दूँगा चाय।
छोटू- चाय भी नहीं मिलेगी। बंटी ऐ बंटी नाराज है क्या ?
बंटी- कहते हैं मूर्ख दोस्त से बुद्धिमान दुश्मन ज्यादा अच्छा।
छोटू- मैंने क्या बेवकूफी की है अब ?
बंटी- जब तूने मुझे अपना चोरी का आइडिया सुनाया था, तभी मुझे समझ जाना चाहिये था कि तू कितना बड़ा....
छोटू- क्या क्या ? हमने तय किया था कि हम इस संबंध में कोई बात नहीं करेंगे अब, और मैं बता दूं कि मेरा आयडिया एकदम सही था। एक तीर से दो शिकार।
बंटी- अच्छा! सर्कस से शेर चोरी करते हैं ये सही आयडिया था ? और तू सही कह रहा है एक तीर से दो शिकार। तीर होता शेर और शिकार होते हम दोंनो कभी सुना हैं तूने किसी ने सर्कस से शेर चोरी किया है?
छोटू- तो क्या करते बदला तो लेना था ना ? निकाल दिया सर्कस से बताओ। पूरी जिंदगी वहीं काटी जगलिंग करते, रस्सी पे साइकिल चलाते और अचानक एक दिन कह दिंया तुम्हारी जरूरत नहीं है शेर करते तो सर्कस का भी घाटा होता और शेर बेचते तो हमें भी फायदा होता हैं।
बंटी- अरे शेर बाजार में लेकर घूमते किये तो शेर खरीद लो।
छोटू- तू मेरे साथ शेर चोरी करने क्यों आया था ?
बंटी- तब थोड़ी पता था कि बाहर ऐसे शेर बिकते नहीं हैं।
छोटू- एक दहाड़ मारी शेर ने तो बचाओ बचाओ चिल्लाने लगा।
बंटी- तू जब पिंजरे के ऊपर चढ़ा था तो पिजरा खोलूं ये पूछा था ? सीधे पिंजरा खोल दिया।
छोटू- लेकिन इतना रंगे हाथों कोई नहीं पकड़ाया होगा। मैं पिंजरे के ऊपर बचाओ बचाओ और तू पिंजरा बंद करते हुए बचाओ बचाओ।
बंटी- चिल्ला... सबको बता दे।
छोटू- गलती हो गई।
बंटी- उससे अच्छा तो ये था कि खरगोश चुरा लेते। (ईश्वर प्रवेश करता हैं।)
छोटू- नहीं नहीं हाथी।
बंटी- श श।
छोटू- अरे मैंने देखा है हाथियों को पैसे कमाते हुए।
बंटी- चुप रह।
छोटू- बंटी, हाथी हमें कमा-कमा के हमें पैसे देता रहता और हम दोंनो हाथी की पीठ पर एक बड़ा सा घर बना लेते।
ईश्वर- सही है पहले शेर चोरी करते पकड़े गए अब हाथी चोरी करने की प्लानिंग कर रहें हो?
सीन-11

(काया ताली बजाती है कहानी रूक जाती है।)

सैम- हाँ हाँ हाँ मैंने जानबूझकर नहीं किया ये हो गया।
काया- नाम बदलो उसका।
सैम- नाम बदलने से क्या हो जायेगा यूँ भी ईश्वर मेरे एक पुराने दोस्त का नाम भी है।
काया- झूठ मत बोलो।
सैम- अच्छा ठीक है अब उसे ईश्वर नाम से कोई नहीं पुकारेगा।
काया- कितने जिद्दी हो तुम और मैंने तुमसे कहा था मुझे छोटू-बंटी की कहानी नहीं सुननी है।
सैम- तुम्हें क्या लगता है अब ये कहानी मैं कह रहा हूँ। कहानी की सिर्फ शुरूआत मेरे हाथ में थी। अब जैसी कहानी तुम देखना चाहती हो और जैसी बात ये कहना चाहते हैं।
काया- तुम्हारे इस पागलपन का एक अंत हैं मेरे पास और वो मेरे लिये सुखांत होगा।
सैम- क्या ?
काया- अगर कहानी नहीं कह पाओ तो माफी मांग लेना। मैं तुम्हें माफ कर दूँगी।
सैम- माफी तो नहीं माँगूगा और ये जिद हैं।
काया- अच्छा देखेंगे।
सैम- देखते है।
सीन-12
चाय- वर्मा जी, आज तो ग्राहकी भी कम हैं तो वहाँ स्टूल पे बैठ जाऊँ ?
वर्मा- नहीं
चाय- अच्छा थोड़ा सा इधर कोने में ऐसे।
वर्मा- नहीं।
चाय- अच्छा ऐसा हाथ करके ऐसे खड़ा हो सकता हूँ ना ?
वर्मा- स्टूल से दूर रह।
चाय- वर्मा जी कितना अच्छा लग रहा हूँ देखो।
वर्मा- देख दिमाग का दही मत कर अभी ट्रेन आने में टाईम हैं कोई ना कोई तो आयेगा।
चाय- जब आएगा तो उठ जाउँगा। बहुत दिनो से कोई किस्सा नहीं सुना।
वर्मा- बेटा किस्से सुनने के लिए अच्छे कान चाहिए। ये खाना बनाने वाले और खाना खाने वाले के संबंध जैसा होता हैं। खाना खाने वाला जितना चटकारे मारकर खाना खायेगा उतना ही खाना बनाने वाले को मजा आएगा।
चाय- पर मैं तो आपकी बनाई हुई चाय भी क्या चटकारे मारकर पीता हूँ।
वर्मा- तो अभी चाय ही पियो खाने में बहुत टाईम हैं। जरा सलीम भाई पे ध्यान दें, बहुत दिनांक बाद उनको ग्राहक मिला है। अगर काम हो गया तो तेरे मुंशी की किताब दिलाऊँगा।
चाय- प्रेमचंद... मुशी प्रेमचंद।
वर्मा- जो भी... अभी धंधा देख।

सीन- 13

सलीम- देखो ये मेरा धंधा है तुम जो भी कहोगे वो तुम्हारे मरते ही सब दफन हो जायेगा मैं धंधे में गद्दारी नहीं करूँगा, ये वादा है।
आशीष- मैं तो मरने ही वाला हूँ। उसके बाद तुम कुछ भी करो मुझे कोई मतलब नहीं।
सलीम- ठीक है पर क्या है क्यों मरना हैं कि अपेक्षा मरने के बाद सब उनके बारे में क्या सोचेंगे इससे लोग ज्यादा डरे हुए रहते हैं इसलिये
आशीष- मेरी कहानी का नाम भी डर ही है। ये कहानी एक ऐसे आदमी की कहानी है जो सबसे डरता है छिपकली, कॉकरोच, रात से, रात में पहाड़ से, पेड़ से और सन्नाटे से... ये आदमी शादीशुदा है और एक बैंक में कलेक्शन का काम संभालता है। दिनभर फील्ड पर रहता है कभी-कभी घर के पास होता है तो घर होता हुआ जाता है। उसकी पत्नी का एक प्रेमी है। पर हमेशा बेवक्त जब भी वो घर पहुँचता है तो दरवाजे पर घंटी बजाने के ठीक पहले वो एक डर महसूस करता है। डर कि कहीं वो दोनो साथ तो नहीं होंगें कैसे होंगे अभी क्या कर रहे होंगे मेरे पास सॉरी उसके पास घर की एक चाबी होती है पर वो हमेशा दरवाजे पे खड़े होकर फोन करता है अपनी पत्नी से कहता है कि मैं दस मिनट में आ रहा हूँ और फिर दरवाजे के बाहर खड़ा होकर इंतजार करता है। दस मिनट बाद बिना घंटी बजाये एक अच्छे पति की तरह दरवाजा खोलकर अंदर जाता है। कभी-कभी वो दोनों उसे साथ दिखते है और कभी नहीं। पर जब भी वो दोनों साथ मिलते है तो वो सीधा अपने बेडरूम में जाकर अपने बेड पर बेतरतीब से बिछी हुई चादर देखता है। बहुत से अजीब से ख्याल उसके मन में आते हैं। फिर अंत में वो दिखावे के सुखी विवाहित जीवन से परेशान होकर उन दोनों का उसी बेड पर रंगे हाथों पकड़ता है और ...... पर असल में ..... मैं अभी भी दस मिनट दरवाजे के बाहर खड़ा होकर इंतज़ार ही करता हू।
सलीम- वैसे ये अकेली ही वजह से बहुत से लोग आत्महत्या कर चुके हैं।
आशीष- नहीं .... मुझे लगता है सिर्फ ये ही वजह ठीक नहीं है मरने की। इस घटना की प्रतिक्रिया आत्महत्या नहीं हो सकती।
सलीम- चाय पीयोगे?
आशीष- हां।
सलीम- चाय ... एक चाय लाना। मैं अभी आया। ये कहानी का नाम क्या बताया तुमने?
आशीष- डर .....
गाना-
रा... रा.... रा... डर है
चारों तरफ फैला हुआ जंगल नहीं है
शहर है। डर है ...
काली रात का डर है, सन्नाटे का डर है
डर है ...
बंद हैं जो दरवाजे़, नहीं सुनी जो आवाजे़ं
उन आवाजों के सुनने का
उन दरवाजों के खुलने का
डर है ..... डर है।
और बचने को इक छोटा सा घोंसले सा घर है
डर है ... डर है।
पर घर के कोनों में भी छिपी हुई है छिपकली जैसी रात।
होंठों पे सूख के पपड़ी बन गई कह ना सके जो बात।
उस छिपी हुई रात का डर है।
उस अनकही बात का डर है ...... डर है। रा... रा... रा.... रा....

सीन-14

(गाना खत्म होता है भाई और एक उसका एक दोस्त, कौए को खींचकर अलग ले जाते हैं।
भाई- क्यों बे कौवे, तुझे कितनी बार समझाया है बीच में नहीं गाना
कौआ- भैया....
भाई- भाई मत बोल क्या कहा था क्या बोलना? क्या कहा था?
कौआ- उस्ताद...
भाई- अब तू दस बार कांव-कांव करेगा।
कौआ- मैं नहीं करूंगा।
भाई- तू कौवा है और तू कांव-कांव करेगा। यही तेरी सजा है.... कर नहीं तो देता हूं.......
कौआ- कांव-कांव-कांव-कांव......
(भाई हंसता है)
कौआ- मां! बापू आये तो कहना मैं चला गया।
मां- कहां जा रहा है?
कौआ- बापू ने सही कहा था खुद के मरने से स्वर्ग मिलता है। मैं खोज में जा रहा हूं कि मैं क्या हूं?
मां- बेटा ऐसी बात को दिल पर नहीं लेते, तू जितना तेरे लिये परेशान है हम लोग भी तेरे लिये उतना ही परेशान हैं। तूने देखा बापू तेरी कितनी चिंता करते हैं?
कौआ- मां! बापू के कहने पर कोई कहानी कह रहा है, कोई गाना गा रहा है। सभी कुछ ना कुछ कर रहे हैं। पर मैं क्या कर रहा हूं? ना तो मैं गाना गा पाता हूं ना कहानी कह पाता हूं। मैं जब तक सोच नहीं लेता कि मैं क्या कर सकता हूं मैं वापिस नहीं आऊंगा।
(बापू स्केटिंग करते हुए एक विंग से दूसरे विंग पर चले जाते हैं उनके गिरने की आवाज़ आती है)
कौआ- मां! बापू को भी बता देना।
(चला जाता है)
मां- बेटा.....
कौआ- मां! मुझे अब रोकना मत मैं जा रहा हूं।
मां- बेटा जब मैं तेरे बाप को नहीं रोक पाई तो तुझे क्या रोकूंगी। शाम को जल्दी आना फिर इंसान-इंसान खेलेंगे।
कौआ- मां....
मां- अच्छा जा।

सीन-15
ईश्वर- कैसे चुराओगे हाथी?
छोटू- हम लोग सबसे पहले.....
बंटी- मज़ाक कर रहे थे हम लोग.... टाईम पास। इसे भूख लग रही थी तो मेरा सिर खा रहा था।
ईश्वर- भूख लगी है... पान खाओगे? नहीं एक काम करो पहले खाना खाना फिर तुम लोगों को कुछ मीठा खिलाऊंगा और फिर पान खाना। चलेगा .....?
छोटू-बंटी- हां चलेगा।
ईश्वर- पर खाना तो तुम्हें मिलेगा नहीं और कुछ चाहिये तो बता दो। (छोटू-बंटी एक दूसरे की ओर देखते हैं ईश्वर लेट जाता है।)
बंटी- चाय?
छोटू- चाय.... हां चाय?
बंटी- हां चाय ठीक रहेगी।
छोटू- एक चाय मिल जाये तो....
ईश्वर- चाय.. एक चाय देना।
चाय- पैसे....?
ईश्वर- मैं दूंगा... क्या करे हो तुम लोग चोरी-चकारी के अलावा...?
छोटू- हम दोनों सर्कस में काम करते थे फिर उस सर्कस वाले ने हम दोनों को निकाल दिया तो .....
ईश्वर- सर्कस में जोकर थे?
छोटू- नहीं ये जगलिंग करता था।
ईश्वर- जगलिंग मतलब...?
छोटू- मतलब चार-पांच गेंदो को एक साथ हवा में उछालने का काम।
बंटी- और ये रस्सी पर साईकिल चलाता था।
ईश्वर- और....
छोटू- और....और क्या?
ईश्वर- और क्या करते थे?
छोटू- और ये वहीं खेल आंख बंद करके भी करता था। है ना........
बंटी- हां और ये रस्सी पर आंखे बंद करके भी साईकिल चलाता था।
ईश्वर- और....?
छोटू- और .... और ये जगलिंग करते हुए.... करते हुए एकदम मस्त.....
बंटी- और ये साईकिल चलाते वक्त हांथों को ऊपर नीचे भी....
छोटू- ऊपर नीचे नहीं कर पाता था हाथों में डंडा होता था।
बंटी- डंडा भी हाथों में और बहुत बढ़िया..... एकदम.....
ईश्वर- और....?
छोटू- और.....
बंटी- और.....
छोटू- और..... हम दोनों बचपन से सर्कस में.... है ना और...
बंटी- और .... बस।
ईश्वर- ठीक है। ठीक है समझ गया तुम दोनों क्या थे।
छोटू- तूने वो नहीं बताया कि मैं हाथी को नहलाता भी था।
बंटी- जैसे तूने बड़ा बताया कि मैं तोते को बोलना सिखाता था.. बेवकूफ....
छोटू- बेवकूफ मत बोल। गाली सिखाई थी तूने तोते को.....
बंटी- अच्छा चुप रह...।
छोटू- अब बोलूं.....एक बार चलते शो में तोते ने कहा था तेरी मां की.....
ईश्वर- चुप एकदम.....सोने भी नहीं देंगे।
चाय- ये....चाय।
ईश्वर- नहीं देना है किसी को


सीन-16

चाय- चाय।
आशीष- धन्यवाद।
चाय- सलीम भाई कहां है?
आशीष- आ रहे हैं.... पैसे चाहिए?
चाय- नहीं वो तो सलीम भाई देंगें।
आशीष- इतने खुश क्यों हो?
चाय- मैं बता नहीं सकता... चलता हूं।
आशीष- नहीं.... नहीं इतने खुश क्यों हो बोलो..?
चाय- बहुत दिन से सलीम भाई खाली बैठे थे, उनकी कमाई होती है तो हमको भी हर चाय का सौ रूपया मिलता है।
आशीष- अच्छा।
चाय- सलीम भाई को मत बताना।
आशीष- नहीं बताऊंगा।
चाय- मरना है
आशीष- एक चाय और दोगे?
चाय- अभी लाया।


सीन-17

ईश्वर- अरे ज़़रा उधर खिसकेंगे मुझे सोना है अरे भाई सुनाई नहीं दे रहा है क्या, अरे उठो भाई। अबे उठता है कि तेरी तो
ब्रम्हानंद- आ आ (चीखता है ईश्वर डर जाता है और वहां से अलग हट जाता है और वर्मा के पास पहुंचता है)
वर्मा- हां, क्या हुआ?
ईश्वर- अरे कुछ नहीं यार वो तो मैं बस सोना चाह रहा था मैंने बोला सरक जाओ तो वो चिल्लाने लगा। अगर मेरा एरिया होता तो साले को अंदर कर देता। कौन है ये
वर्मा- ब्रम्हानंद।
ईश्वर- अरे कौन ब्रम्हानंद?
चाय- मैंने देखा था आपको आप ब्रम्हानंद को मारने वाले थे तभी वो चीखा। ऐसे वो किसी को कुछ नहीं बोलता है
ईश्वर- तू कौन है बे? ये कोन है?
चाय- चाय।
ईश्वर- क्या?
चाय- चाय... सुनाई नहीं दे रहा।
ईश्वर- अब नाम पूछ रहा हूं तेरा काम नहीं।
वर्मा- अरे वो सच कह रहा है, इसका नाम ही चाय है।
ईश्वर- तो जाके चाय बेच बीच में मत बोल। चाय। ये ब्रम्हानंद इसी गांव का है?
वर्मा- हां।
ईश्वर- यहां क्या कर रहा है इसके बाप का स्टेशन है।
चाय- हां इसके बाप का ही है।
ईश्वर- अब तू
वर्मा- वो सही कह रहा है इसके बाप का ही है।
ईश्वर- मतलब?
वर्मा- ऐसा कहते है कि ये ब्रम्हानंद के पुरखों की जमीन थी, जिस पर सरकार ने रेलवे स्टेशन बना दिया। और वादा किया था कि इनको कहीं और जमीन देंगे, पर वो दी नहीं गई तो ये यहीं रहने लगा पहले इसके दादाजी यहां बैठते थे फिर पिताजी और फिर ये।
ईश्वर- ये तो गैर कानूनी है। इसको कोई भगाता नहीं?
वर्मा- क्यों भगायेंगे साहब, ये रेलवे स्टेशन को अपना घर मानता है और यहां के हर व्यक्ति को अपना मेहमान। सबकी खैर तबीयत पूछता है, पूरे स्टेशन को साफ रखता है। हर आने वाले को नमस्कार करता है, और हर जाने वाले को फिर आइये का सलाम। और इंतजार करता है।
ईश्वर- कौन कहते हैं?
वर्मा- ऐसा कहते है ये एक चमत्कार जैसा कि जिसका वो इंतजार करता रहता है।
ईश्वर- चमत्कार का इंतजार है।

इ्रंतजार इंतजार इंतजार इंतजार

सीन-18

भाई- मां! चल अब खाना खा ले बापू आते ही होंगे।
मां- तुझे खाने और गाने के अलावा और कुछ सूझता भी है। महीना होने को आया , अभी तक उसका पता नहीं चला कहां चला गया होगा। तेरे बापू भी उसको ढूंढ-ढूंढकर परेशान हैं।
भाई- मां! मैं भी उसे पिछले एक हफ्ते से ढूंढने जा रहा हूं। बाहर जाते ही डर लगने लगता है। शायद मेरे ही डांटने की वजह से वो चला गया है। वैसे ही मैं बहुत दुःखी हूं, तू खाना खा ले वरना मुझे और बुरा लगेगा।
मां- जो भी हो, जब तक वो नहीं आएगा मैं खाना नहीं खाऊंगी।

गाना-
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
वो तो चला गया रे
वो तो चला गया समुन्दरों के पार
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
वो चला गया समुन्दरों के पार -3
छोटा सा पंछी वो नन्हीं सी जान रे -2
कैसे वो झेलेगा आंधी तूफान रे -2
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार वो लेकर के आयेगा कोई ऐसी किताब
जिसमें मिलेंगे सब सवालों के जवाब
वो नाम करेगा, ऐसा काम करेगा।
चाहे रास्ते में आए मुश्किलें हजार।
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
मेरा काला रे
मेरा कौआ काला रे
मेरा काग रे।
मेरा काला कागा रे
मेरा काक रे
वो जो बोले कांव, सुन के कोयल हो बेहाल, मैं तो हो जाऊं निहाल।
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार

सीन-19

छोटू- बंटी, हम कब तक जिंदा रहेंगे?
बंटी- क्या
छोटू- हम कब तक जिंदा रहेंगे?
बंटी- एक घंटे तक अरे मुझे क्या पता।
छोटू- और बंटी जब तक मैं जिंदा रहूंगा मैं छोटू ही रहूंगा और जब तक तू जिंदा है तू बंटी ही रहेगा?
बंटी- हां।
छोटू- याद है तूने मुझे ध्रुव तारा दिखाया था। सुबह चार बजे। वो कब से ध्रुव तारा ही है बेचारा ध्रुव तारा
बंटी- तो क्या है?
छोटू- मुझे इसी बात पे कभी-कभी रोना आ जाता है कि मैं कुछ नहीं होऊंगा मैं अपने मरने तक छोटू ही रहूंगा अंत तक छोटू एकदम अंत तक अरे ये रस्सी खुल गई साब साब ये रस्सी खुल गई।
बंटी- अबे
ईश्वर- इन दो जोकरों को भी तो संभालना है (ईश्वर छोटू-बंटी के पास जाता है।)

सीन-20

वर्मा- जल्दी से स्टूल साफ कर। ऐसे भूखे बहुत कम आते हैं।
चाय- मतलब
वर्मा- आज खाना बनाने में मजा आएगा। ये संभाल अपनी चाय की केतली और ये रहे कम और तू निकल ले।
चाय- मैं चुपचाप यहां कोने में बैठा रहूंगा। प्लीज प्लीज।
वर्मा- दिमाग का दही मत कर। वरना स्टूल पे बैठना तो दूर उसे साफ भी नहीं कर पायेगा।
चाय- और बीच में अगर चाय ठंडी हो गई तो।
वर्मा- तू जो मोटी-मोटी किताबें पढ़ता है ना उसे जलाकर गर्म कर लेना। चल अब जा भूखा आ रहा है।


सीन-21

आशीष- मेरी अगली कहानी का नाम फादर है- पिता।
सलीम- क्या हुआ?
आशीष- कुछ नहीं।
सलीम- देखो वैसे ये तुम्हारे किसी काम का नहीं है पर चूंकि ये मेरा धंधा है सो मैं बता दूं कि मैं अपनी क्लाइंट को क्या-क्या प्रोवाइड कराता हूं। कागज, कलम, डेथ नोट लिखने के लिए। किसे देना है, कितने दिनों में देना है आप ये भी बता सकते हैं। डेथ नोट लिखने में समस्या हो तो मेरे पास कुछ सौ से ज्यादा लोगों के डेथनोट हैं आपको उससे मदद मिल सकती है। और आपको बता दूं कि ये जगह आत्महत्या के लिए काफी प्रसिद्ध है। बाहर-बाहर से लोग यहां आत्महत्या करने के लिए आते है। मरे अधिकतर क्लांइट ने चार दस की सुपर फास्ट ट्रेन से आत्महत्या की है। वो यहां रूकती नहीं है धड़धड़ाती आती है और एक झटके में काम खत्म। और अब मुख्य बात इसके बदले में मुझको क्या मिलता है? मुझे मिलता है वो सब जो इस वक्त आप के पास है। पर्स से लेकर घड़ी, अंगूठी, चेन वगैरह-वगैरह... अरे आप हंस रहे हैं। इसमें मुझे घाटा भी होता है कई बार मुझे लोगों का अंतिम संस्कार अपने पैसों से करना पडा। अमीर ही नहीं गरीब लोग भी आत्महत्या करते हैं।
आशीष- ये लो। मुझे किसी को कुछ नहीं बताना (आशीष अपने जेब से पर्स, अंगूठी और घड़ी निकाल कर उसे दे देता है।)
सलीम- ये कहानियां भी दे दो
आशीष- नहीं मैं इन्हें अपने साथ ले जाना चाहता हूं।
सलीम- ठीक है आखिरी कहानी।
आशीष- हां फादर पिता बाप।

सीन-22

(ईश्वर, ब्रम्हानंद के चेहरे को देख रहा है)
ईश्वर- मुझे इस पर शक है। वर्मा जी मुझे इस आदमी पर शक हैं
वर्मा- क्या बात है मान गये आपको। आप पहले आदमी हैं जो समझ गए।
ईश्वर- क्या समझ गए?
वर्मा- यही कि ब्रम्हानंद असल में जाग रहा है।
ईश्वर- क्या? हाँ... अ अ मैं समझ गया वो जाग रहा है कैसे?
वर्मा- ब्रम्हानंद ने एक बार कहीं पढ़ लिया था कि एक आदमी ने एक बार तितली का सपना देखा। पर जब वो जागा तब उस आदमी को समझ में नहीं आया कि वो आदमी है जिसने तितली का सपना देखा या वो तितली है जो अभी आदमी का सपना देख रही है।
ईश्वर- हैं?
वर्मा- ऐसा कहते हैं कि ब्रम्हानंद ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया और अब वो खोज रहा है कि वो असल में क्या है तितली या आदमी?
ईश्वर- तो क्या है वो?
वर्मा- अरे आप तो देखते ही समझ गये थे। है ना?
ईश्वर- हां हां मैं समझ गया।

सीन-23

आशीष- ये एक ऐसे आदमी की कहानी है जो अपने पिता के साथ अकेला रहता है। मां थी नहीं और बड़ा भाई सालों पहले दुबई में काम करने चला गया। सुना था अब वो काफी पैसे कमाने लगा है। इसकी अभी-अभी छोटी नौकरी लगी थी जैसे-तैसे वो घर का गुजारा करता था तभी पिताजी को पैरालेटिक अटैक आ गया उनका चलना फिरना, बोलना सब बंद हो गया। कुछ समय तक ये अपने पिताजी का इलाज कराता रहा पर कुछ फायदा नहीं हुआ। यहां कर्जा भी बहुत बढ़ गया था। उसने भाई को पैसे के लिए खबर की पर वहां से कोई जबाव नहीं आया तो ये कारण बटोरने लगा।
सलीम- कारण किसके?
आशीष- कारण अपने बाप की हत्या के। उसमें बचकाने से बुद्धिजीवी सारे कारण मौजूद थे इतनी तकलीफ में घिसटते-घिसटते जी रहे हैं, जीवन से सारे संबंध खत्म हैं फिर क्यों जिंदा हैं, वगैरह-वगैरह और फिर एक दिन उसने अपने पिताजी के खाने में जहर डाल दिया। पिताजी की मृत्यु के कुछ ही दिन बाद भाई का दुबई से पैसा आ गया पिताजी के इलाज के लिए जबकि असल में भाई का दुबई से पैसा पिताजी के मरने से पहले आया था पर वो इतना पैसा था कि उन पैसों को पिताजी के इलाज के लिए खर्च करना मुझे बेवकूफाना लगा और पिताजी
सलीम- असल में तुमने पिताजी को जहर
आशीष- हां दिया था और जिन कारणों को उस वक्त अपने साथ रखा था वो सारे कारण अब मुझ पे लागू होते हैं।
सलीम- मतलब?
आशीष- मतलब में बस सांस ले रहा हूं जीवन से मेरा संबंध कब का छूट गया है हर आदमी मेरा क्लाइंट है या मैं किसी का क्लाइंट हूं सबकी आंखों में मैं अपना भारीपन देखता हूं अपने होने का भारीपन, जो मैंने मेरी आंखों में तब महसूस किया था जब मैं अपने बाप को मारने के कारण जमा कर रहा था।
सलीम- तो अब?
आशीष- अब तुम बताओ कैसे करना है?
सलीम- चार बज गया है ट्रेन आती ही होगी तैयार हो जाओ।
आशीष- एक आखिरी चाय।
सलीम- हां, क्यों नहीं चाय! चाय! कहां मर गया। मैं खुद बोल कर आता हूं।

सीन-24
ईश्वर- ब्रम्हानंद ऐ ब्रम्हानंद
वर्मा- वो नहीं सुनेगा।
ईश्वर- क्यों?
वर्मा- क्योंकि हम उसे ब्रम्हानंद कहते हैं लेकिन शायद उसे नहीं पता कि उसका नाम ब्रम्हानंद है।
ईश्वर- क्या? वो ब्रम्हानंद है उसे नहीं पता लेकिन तुम उसे ब्रम्हानंद कहते हो तो तुम्हें कैसे पता उसका नाम ब्रम्हानंद है
वर्मा- क्येांकि बहुत पहले ट्रेन में से एक आदमी ने ब्रम्हानंद चिल्लाया था और तब ये मुड़ा था दूसरे ब्रम्हानंद में ये खड़ा हुआ था और तीसरे ब्रम्हानंद चिल्लाने पर ये बहुत तेजी से भागा था मगर तब तक ट्रेन निकल चुकी थी। ओह अब समझ में आया ये हर ट्रेन के डिब्बे में इसलिए झांकता फिरता है कि ये शायद पता करना चाहता है कि किसने इसे इसके नाम से पुकारा।
ईश्वर- हां हां
वर्मा- शायद
ईश्वर- शायद शायद क्या?
वर्मा- देखो सच किसी को नहीं पता ऐसा कहते हैं?
ईश्वर- ये तुम्हारे स्टेशन पे कौन हैं जो कहते हैं कौन हैं ये?

गाना-
ये हम हैं जो कहते हैं, हां हां हम हैं जो कहते हैं
ज़रा नज़रें उठाकर देखो तो हम आसपास ही रहते हैं।
ये हम हैं जो कहते हैं।
कहते हैं दुनिया को ऊपर वाले ने हाथों से अपने बनाया था।
कहते हैं आदम अकेला था पहले फिर हौवा ने आके मुस्कराया था।
उसके ही कहने से फल खाया पहले खाया पहले फिर?
फिर कहते हैं धक्का भी खाया था।
कहते हैं उसकी ही संतान हैं सब। कौन हैं जो ये कहते हैं?
ये हम हैं जो कहते हैं, हां हां हम हैं जो कहते हैं
ज़रा नज़रें उठाकर देखो तो हम आसपास ही रहते हैं।
ये हम हैं जो कहते हैं



सीन-25

(गाना खत्म होता है सभी एक जगह इकट्ठे होकर बैठ जाते हैं।)
बापू- अरे क्या हुआ? चलो अपनी-अपनी जगह। अरे जाओ खड़े क्या हो? अरे चलो अपनी-अपनी कहानियां शुरू करो।
भाई- अभी क्या कहें?
बापू- मतलब कहानी किसने रोकी? कहानी किसने रोकी?
सैम- कहानी मैंने रोकी।
बापू- ये बेईमानी है।
सैम- माफ करना दो मिनट
काया- मैं कुछ कहूं।
सैम- हां, बस शुरू कर रहा हूं।
काया- मैं बस बताना चाहती हूं कि तुम्हारी ट्रेन का टाईम हो रहा है।
सैम- मैं जानता हूं।
काया- क्या करोगे प्रेम कहानी, ऊपर से सुखांत
सैम- हं
काया- मैं जानना चाहती हूं कैसे करोगे?
सैम- मृत्यु के बारे में इतना सोचोगी तो जीयोगी कब?
काया- क्या?
सैम- क्या हम जीते हुए लगातार मरने के बार में सोचते हैं नहीं ना अंत अपनी गति से होगा।
काया- पर अंत बोलने से तो नहीं होगा ना अंत करना पडेगा, पहली बार तुम इतनी बुरी तरह फंसे हो। है ना?
सैम- हं
काया- मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ी दया आ रही है।
सैम- हा हा हा
काया- क्या हुआ?
सैम- मिल गया मुझे अंत।
काया- क्या?
सैम- हां अंत मिल गया अब मेरी इस प्रेम कहानी का अंत तुम्हीं करोगी अब अंत तुम्हारे हाथ में है।
काया- मैं? मुझे नहीं पता तुम क्या करने वाले हो? पर तुम्हारे पास समय कम है अगर अंत नहीं हुआ तो मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।
सैम- पक्का। हा हा (हंसता है) शुरू करें?

(सैम कबूतरों की तरफ पलटता है, कहता है अंत है, जरा जमाके)
बापू- ताली तो बजा दो।
(सैम ताली बजाता है सब घूमकर एक तरफ देखने लगते हैं वहां से कहानी शुरू हो जाती है। कौआ प्रवेश करता है आकर बापू के गले लग जाता है।)

कितनी सारी चांद की रातें, कितना दिन का उजाला
क्या होता मतलब सफेद का यारों, जो ना होता रंग काला

मां- बेटा कहां चला गया था इतने दिन? कितनी चिंता हो रही थी तेरी।
कौआ- मां मुझे पता लग गया है कि मैं कबूतरों के बीच एक कौआ हूं।
बापू- किसने कहा तुझसे किसने कहा?
कौआ- इस बार किसी ने नहीं कहा मुझे पता लग गया है और मुझे इसमें कोई समस्या नहीं है। बापू मैं बाहर गया था बाहर संसार में मैं उड़ता रहा उड़ता रहा ना जमीन खत्म होने का नाम ले रही थी ना आसमान और तभी अचानक पता नहीं कहां से बहुत सारी भीड़ आ गई। बापू वो सब हवाई जहाज़ की तरह उड़ रहे थे बहुत तेज़ पता नहीं कितने तरीके के किसने सारे पक्षी उड़ रहे थे और वो कौए भी नहीं थे कबूतर भी नहीं थे फिर मैंने उनसे पूछा-
सैम- आप लोग कौन से स्टेशन पर रहते हैं और कौन से स्टेशन जा रहे हैं?

(सभी हंसने लगे)
मैं कौआ क्यों हूं?
(सभी हंसते हैं)
जब सभी कबूतर हैं तो मैं कौआ क्यों हूं

(तभी एक बूढ़ा आदमी सैम के बगल में आकर उड़ता है।)

बूढ़ा- तुमने क्या कबूतर कहा?
सैम- हां कबूतर।
बूढ़ा- बहुत पहले की बात है कि मैं जब ध्रुव से दक्षिण ध्रुव की ओर जा रहा था अचानक मुझे प्यास लगी। मैं नीचे जमीन पे एक पोखर में पानी पीने रूक गया। मैंने देखा वहां बहुत से सफेद-सफेद मोटे-मोटे पक्षी थे जो अपने आपको कबूतर कहते थे। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं दक्षिणी ध्रुव की तरफ जा रहा हूं तो सब मुझ पर हंस दिये पर उसमें से एक कबूतर था जो मुझ पे हंसा नहीं था। जब मैं दक्षिणी ध्रुव की तरफ रवाना हुआ तो वो काफी दूर तक मेरे साथ चला। फिर बीच में थक गया तो मैंने उससे कहा वापिस लौट जाओ। पर वो नहीं माना फिर वो बीच में कहीं भटक गया।
सैम- क्या वो दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचा था?
बूढ़ा- वो तो पता नहीं पर ऐसा कहते हैं कि उसे अलग-अलग समय में अलग-अलग जगह देखा गया तुम कहां जा रहे हो?
सैम- खोज में
बूढ़ा- किसकी
सैम- मैं कौआ क्यों हूं?
बूढ़ा- तुम्हारी आंखों में भी उस कबूतर की आंखों जैसी चमक है। मैंने उससे भी यही कहा था कि हम कितने किस्मत वाले हैं जो हमारे पंख हैं ज़रा उन बेचारों के बारे में सोचो जिनके पंख ही नहीं है तुम्हारे पास पंख है, उड़ने की क्षमता है। क्या ये काफी नहीं है।
सैम- पर मैं कौन हूं?
बूढ़ा- हा हा हा। अगर इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें उड़ने में मदद होगा तो उत्तर ढूंढो? मैंने इस तरीके के सारे प्रश्न अपने बुढ़ापे के मनोरंजन के लिए रख छोड़े हैं जब मैं उड़ नहीं पाउंगा।
सैम- आप कौन हैं?
बूढ़ा- मैं
(तभी बहुत सारे पक्षी आकर उन दोनों को अलग कर देते हैं)
सैम- अरे अपना नाम तो बताते जाइये
कौआ- उसने चिल्लाकर अपना नाम बताया पर मैं सुन नहीं पाया।
बापू- विचित्र किंतु सत्य
कौआ- क्या?
बापू- बेटा मैं दक्षिणी ध्रुव तक गया था।
भाई- बापू क्या हो गया आपको?
बापू- मैं दक्षिणी ध्रुव गया था बेटा ये वही विचित्र किंतु सत्य कबूतर हैं जो मेरे सपनों में आता है। तू उसी कबूतर से मिलकर आया है।
भाई- भाई तू भी दक्षिणी ध्रुव तक गया था?
कौआ- नहीं
भाई- तो कहां तक गया था?
कौआ- बहुत दूर तक
भाई- अगली बार मुझे भी लेकर जायेगा?
कौआ- भाई! खुद के मरने से ही स्वर्ग मिलता है। (सब हंसने लगते हैं)


सीन-26

ईश्वर- वो देखो ब्रम्हानंद उठ रहा है।
वर्मा- ओ तेरी ये आज जल्दी क्यों उठ गया (वो आदमी कुली के कपड़े पहनता है अंगड़ाई लेता हुआ वर्मा के पास आता है ईश्वर हक्का-बक्का उसे देख रहा है।)
कुली- क्या भाई ब्रम्हानंद कैसे हो साला नींद टूट गई। चल मुंह धोके आता हूं। मेरे लिए चाय बोल ब्रम्हानंद मैं आता हूं। (कुली निकल जाता है ईश्वर गुस्से में वर्मा को देखता है वर्मा मुस्कुरा देता है)


सीन-27

बंटी- अब शांत रह और प्लान सुन।
छोटू- नया प्लान।
बंटी- नया नहीं आखिनी प्लान अभी चार दस की फास्ट ट्रेन निकलेगी वो क्रास करे उसके पहले हमें पटरी के उस पार कूद जाना है।
छोटू- और ये रस्सी?
बंटी- मैंने काट दी है और तू चुप रहना। सिर्फ भाग बोलूंगा और सीधा पटरी के उस पर कूद जाना जब तक ट्रेन क्रास करेगी हम भाग चुके होंगे।
छोटू- बंटी! बिना भागे काम नहीं चलेगा।
बंटी- छोटू! मार खायेगा।
छोटू- सॉरी।

सीन-28
चाय- ये चाय
आशीष- हं
चाय- चलता हूं
आशीष- सलीम भाई तुम्हें ही बुलाने गये हैं।
चाय- पता है। मैं पीछे से आया आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
आशीष- बोलो
चाय- बोलो
चाय- पश्चाताप जीने में है मरने में नहीं माफ करना चलता हूँ।

सीन-29
(ईश्वर, वर्मा का कॉलर पकड़े हुए हैं।)
वर्मा- बताता हूं बताता हूं। मैं ही ब्रम्हानंद हूं। मेरा नाम ब्रम्हानंद वर्मा है।
ईश्वर- अबे तो मुझे बेवकूफ बनाने की क्या जरूरत थी?
वर्मा- मुझे क्या पता था आज ये जल्दी उठ जायेगा देखो मुझे रात भर जागना पड़ता है और ये रात भर सोता है। ये मेरे मनोरंजन का साधन है। आज पहली बार पकड़ा गया हूं। माफ कर दो।
ईश्वर- ठीक है लेकिन एक शर्त पर कि तूने मुझे बेवकूफ बनाया ये बात किसी को नहीं बतायेगा।
वर्मा- अच्छा, ठीक है।

सीन-30
छोटू- बंटी हमने अभी तक सिर्फ भागने के बारे में बात की है भागे कभी नहीं है।
बंटी- मतलब?
छोटू- मतलब हमने कभी भागना सीखा ही नहीं है हम भागने के लिए बने ही नहीं हैं। हमें बस एक जगह रहना आता है।
बंटी- तू चुप रहेगा? ट्रेन आने वाली है, तैयार हो जा।

सीन-31

सलीम- तो चलें
आशीष- कहां?
सलीम- यहां नहीं आगे। उस खंभे के पास ट्रेन आने वाली है।
आशीष- मेरी एक बात मानोगे?
सलीम- जो बोलो
आशीष- मैंने तुम्हें कहा था ना कि मैं सबसे डरता हूं कहीं मैं उस आखिरी क्षण में डर ना जाऊं मुझे पता नहीं तो क्या तुम मुझे धक्का दे दोगे?
सलीम- नहीं नहीं ये तो हत्या होगी।
आशीष- तुम्हारा धंधा है तुम आत्महत्या में मदद करते हो। तो मैं मदद ही तो मांग रहा हूं ये हत्या कैसे हुई?
सलीम- ये हत्या है बस और यूं भी मैं तुम्हें वहां छोड़ के आ जाउंगा, मैं कभी आत्महत्या के समय किसी के साथ नहीं रहता इसमें फंसने का डर है। चलें समय हो रहा है।
आशीष- चलो

सीन-32
बंटी- चल ट्रेन आ रही है।
छोटू- बंटी, हम दोनों के बीच भाग-भाग एक खेल है भेड़िया आया, भेड़िया आया जैसा एक खेल। इसमें सच के भेड़िये को मत लाओ।
बंटी- चुप ट्रेन आ गई है। भाग बोलूंगा सामने कूद जाना।
छोटू- बंटी इसे खेल ही रहने दे मुझसे नहीं होगा।
बेटी- अपना हाथ दे मुझे।
छोटू- नहीं।
बंटी- हाथ दे

(सलीम आकर नीचे खड़ा हो जाता है और आशीष को देख रहा होता है ब्लैक आउट होता है छोटू के चिल्लाने की आवाज आती है और साथ में ट्रेन के तेज़ी से निकल जाने की आवाज़ और गाना शुरू होता है स्पॉट आता है आशीष अपनी जगह नहीं खड़ा है। दूसरा स्पॉट आता है बंटी अकेला बैठा रो रहा है ईश्वर, बंटी के पास जाता है और पूछता है छोटू कहां है और बंटी रोता रहता है।)

गाना-
अंधेरे में ढूंढते हैं टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी
सांसो से छूके देखा अपनी है कि अजनबी
अंधेरे में ढूंढते हैं। रा रा रा रा
एक कतरा आंसु का या चमकती इक खुशी
हाथ जाने क्या लगेगा जानता कोई नहीं
अंधेरे में ढूंढते हैं। रा रा रा रा
एक टुकड़ा मेरे हिस्से का दर्द में डूबा हुआ
एक टुकड़ा मुस्कुराकर पूछता है क्या हुआ
एक टुकड़ा चुप्पी साधे
मेरे हाथें ही मौत मांगे। रा रा रा रा
ऐसे कितने टुकड़े सीकर
जैसे-तैसे मरके जीकर।
बन रही है कहानी।
चल रही है कहानी।
बुन रही है कहानी।
तेरी मेरी कहानी।

चाय- क्या हुआ सलीम भाई।
सलीम- अभी देख के आया हूं बुरी तरह कट गया है वो बता देना उनको और ये ले पैसा बहुत कमाई हुई इस बार क्या हुआ?
चाय- कुछ नहीं अच्छा आदमी था।
सलीम- अच्छे तो सभी होते हैं तू ऐश कर।

सीन-33

(आशीष आता है, चाय उसे देखकर उसके गले लग जाता है।)
आशीष- ये मेरी कहानियां हैं अब मुझे इनकी जरूरत नहीं है मैं चार पच्चीस की ट्रेन से जा रहा हूं।
चाय- कहां?
आशीष- नया जीवन शुरू करने। जिंदा रहकर पश्चाताप करने मरकर नहीं।
चाय- ये कुछ पैसे रख लीजिये टिकट तो खरीदना पड़ेगा ना।
आशीष- नहीं चाहिये।
चाय- आप ही के हैं।

सीन-34

सैम- कहानी हमारी पूरा संबंध ये शब्द है, कहानी मुझे पता ही नहीं चला कब तुम्हारी उंगलियों ने कहानी कहना सीख लिया, हां सच। जब मैंने तुम्हें पहली बार कहानी सुनाई थी तब उस कहानी को मैंने तुम्हारी उंगलियों से ही बाहर झांकते हुए देखा था। मैं हमेशा उस क्षण, उस पल को याद करता हूं जब तुम्हारी उंगलियां हिलीं थीं और मैंने एक कहानी को बाहर आते हुए देखा था और मैंने आज तक वो ही कहानियां पढ़ी हैं जिसे तुम्हारी उंगलियों ने दिखाया और तुमने सुनना चाहा।
काया- नहीं तुमने किसी न किसी ब्रम्हानंद के नाम से हमेशा अपनी ही कहानी कही है और तुमने अंत में आशीष को बचा लिया।
सैम- तुम्हीं चाहती थीं कि आशीष ना मरे तुम्हें अजीब लगेगा पर पता नहीं कितनी बार मैंने आशीष को मारना चाहा पर हर बार किसी ना किसी चाय ने आकर उसे बचा लिया और कई बार तो चाय बनकर तुम खुद आई हो।
काया- मैंने तुम्हें आत्महत्या से नहीं बचाया।
सैम- मैं आत्महत्या की बात ही नहीं कर रहा हूं मैं तो अपने उस आदमी की बात कर रहा हूं जो स्कूल के दिनों से तुमसे प्रेम करता था कई बार मैंने उसे मार देना चाहा और हर बार तुम्हारी किसी ना किसी बात ने उसे जिंदा रहने दिया और देखो वो आज तक जिंदा है।
काया- अरे तुम्हारी ट्रेन आ गई।
सैम- हां
काया- पर ये सुखांत नहीं है।
सैम- मैं जानता हूं ये सुखांत नहीं है।
काया- और मुझे सुखांत चाहिये।
सैम- वरना
काया- वरना तुम्हें मुझसे माफी मांगनी पड़ेगी।
सैम- मैंने आज तक जितना तुम्हें प्रपोज किया उससे कहीं ज्यादा तुम्हें कहानियां सुनाई है उन कहानियों का एक घर है जिसके लगभग हर कोने में तुम रह चुकी हो पर ये कहानी उस अंधेरे कमरे की है जो घर की छूटी हुई चीजें लिए पता नहीं कब से बंद पड़ा था स्टोर रूप जैसा और इसके हर पात्र हाशिये पर रखे हुए पात्र थे जो मुख्य पात्र को खूबसूरत दिखाने के लिये हमेशा कहानी के पीछे चुपचाप खड़े रहे। आज तुमने ये कमरा भी खोल दिया। अब किस्सों में नहीं, टुकड़ों में नहीं, जबरदस्ती नहीं, चोरी से भी नहीं बल्कि ये पूरा घर उसके मालिक के साथ तुमसे पूछता है मुझसे शादी करोगी?
ये प्रेम कहानी है और अंत तुम्हारे हाथ में हैं। अगर तुम हां कह दोगी तो सुखांत और ना कह दोगी। तो दुखांत।
काया- ये तो तुमने
सैम- मैंने कहा था अंत तुम्हारे हाथ में है।
काया- तुम्हारी ट्रेन
सैम- जल्दी बोलो मुझसे शादी करोगी? (ट्रेन का साउंड, सारे कबूतर भाग जाते हैं ट्रेन निकल जाती है ब्लैक आउट। लाईट आती है काया अकेली खड़ी है। वो मुस्कुकराकर चली जाती है। कबूतर प्रवेश करते हैं, गाना गाते हैं।)

अब बात फंसी है कुछ ऐसी
होगें आंसु या होगी हंसी
पर अंत तो हमने सुना नहीं
जब अंत हुआ हम उड़े कहीं
अब खत्म ये किस्सा कैसा हो
गर चाहे आंखे नम रहे
और साथ में थोड़ा सा गम रहे
तो थी ये कहानी इस दुखांत
गर चाहे होंठों पे हंसी खिले
और सबको सबका मीत मिले
तो थी ये कहानी इक सुखांत
तो थी ये कहानी इक सुखांत
तो थी ये कहानी|